पूर्व में कालानेमी नाम के एक असुर के छह पुत्र थे, जिनके नाम हंस, सुविक्रम, क्रथ, दमन, रिपुरमर्दन और क्रोधहंता थे. वे शड्-गर्भ, या छह गर्भ के रूप में जाने जाते थे, और वे सभी समान रूप से शक्तिशाली और सैन्य कार्यों के विशेषज्ञ थे. इन शड्-गर्भों ने अपने पितामह हिरण्यकशिपु की संगति छोड़ दी, और भगवान ब्रह्मा को प्रसन्न करने के लिए बड़ी तपस्या की, जिन्होंने संतुष्ट होने पर, उन्हें मनचाहा आशीर्वाद देने की सहमित दी थी. जब भगवान ब्रह्मा ने पूछा कि वे क्या चाहते हैं, तो शड्-गर्भों ने उत्तर दिया, “प्रिय भगवान ब्रह्मा, यदि आप हमें आशीर्वाद देना चाहते हैं, तो हमें आशीर्वाद दें कि हम किसी भी देवता, महोरग, यक्ष, गंधर्व-पति, सिद्ध, चरण या मनुष्य द्वारा न मारे जाएँ, न ही उन महान ऋषियों द्वारा मारे जाएंगे.जो अपने तप – तपस्या में सिद्ध होते हैं.” ब्रह्मा ने उनका उद्देश्य समझ लिया और उनकी इच्छा पूरी की. लेकिन जब हिरण्यकशिपु को इन घटनाओं का पता चला, तो वह अपने पोतों पर बहुत क्रोधित हुआ. उसने कहा, “तुम लोगों ने मेरी संगति छोड़ दी है और भगवान ब्रह्मा की पूजा करने चले गए हो,” और इसलिए मुझे अब तुमसे कोई स्नेह नहीं है. तुमने देवताओं के हाथों से स्वयं को बचाने का प्रयास किया है, लेकिन मैं तुमको ये शाप देता हूँ: तुम्हारा पिता कंस के रूप में जन्म लेगा और तुम सभी की हत्या कर देगा क्योंकि तुम लोग देवकी के पुत्रों के रूप में जन्म लोगे. इस श्राप के कारण हिरण्यकशिपु के पौत्रों को देवकी के गर्भ से जन्म लेना पड़ा और कंस द्वारा उनका वध किया गया, हालाँकि वह पूर्व में उनका पिता था.

स्रोत:अभय चरणारविंद भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद (2014 संस्करण, अंग्रेज़ी), श्रीमद् भागवतम्, दसवाँ सर्ग, अध्याय 01 – अतिरिक्त टिप्पणियाँ

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