“व्यक्ति की भक्ति सेवा तब व्यर्थ हो जाती है जब वह निम्न छः गतिविधियों में बहुत उलझ जाता है: (1) आवश्यकता से अधिक खाना या आवश्यकता से अधिक धन इकट्ठा करना; (2) साधारण वस्तुओं के लिए अत्यधिक प्रयास करना जिन्हें पाना बहुत कठिन होता है; (3) अनावश्यक रूप से व्यर्थ विषयों पर बातचीत करना; (4) शास्त्रीय नियमों का पालन केवल उनके पालन के लिए करना ना कि आध्यात्मिक प्रगति के लिए करना, या शास्त्रों के नियमों का तिरस्कार करना और स्वच्छंदता या मनमाने ढंग से कार्य करना; (5) सांसारिक मानसिकता वाले लोगों के संपर्क में रहना जो कृष्ण चेतना में रुचि नहीं रखते; और (6) व्यर्थ साधारण उपलब्धियों के लिए लालची होना.”

 

स्रोत- अभय चरणारविंद भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद (2014 संस्करण, अंग्रेजी), “श्रीमद् भागवतम्”, सातवाँ सर्ग, खंड 13- पाठ 34

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