मायावादियों और वैष्णवों के दर्शन में अंतर यहाँ बताया गया है. दोनों मायावादी और वैष्णव जानते हैं कि भौतिक कर्मों में कोई सुख नहीं है. इसलिए, मायावादी दार्शनिक, ब्रम्ह सत्यम जगन् मिथ्या, श्लोक से चिपके रहते हुए, कृत्रिम, भौतिक गतिविधियों से दूर रहना चाहते हैं. वे सभी गतिविधियाँ रोकना चाहते हैं और परम ब्रम्हन् में लीन हो जाना चाहते हैं. जबकि वैष्णव दर्शन के अनुसार, यदि व्यक्ति बस भौतिक गतिविधियों से दूर होता है तो वह बहुत देर तक अकर्मण्य नहीं रह सकता, और इसलिए सभी को आध्यात्मिक गतिविधियों में रत होना चाहिए, जिससे इस भौतिक संसार में कष्ट भोगने की समस्या हल हो जाएगी. इसलिए, ऐसा कहा जाता है, कि यद्यपि मायावादी दार्शनिक भौतिक गतिविधियों से दूर रहने और ब्रम्हन में लीन होने को तत्पर होते हैं, और यद्यपि संभवतः वे ब्रम्हन अस्तित्व में वास्तव में लीन हो जाएँ, गतिविधियों की इच्छा में वे फिर से भौतिक गतिविधियों (अरुह्य कृच्छेर्ण परम पदम् ततः पठंति अधः) में पतित हो जाते हैं. अतः तथाकथित त्यागी, ब्रम्हन पर रहते हुए ध्यानस्थ रहने में असमर्थ हो कर, रुग्णालय और विद्यालय खोल कर भौतिक गतिविधियों पर लौट आते हैं. इसलिए केवल यह ज्ञान अपर्याप्त है कि भौतिक गतिविधियाँ व्यक्ति को सुख नहीं दे सकतीं, और इसलिए व्यक्ति को एसी गतिविधियों को रोक देना चाहिए. व्यक्ति को भौतिक गतिविधियों को रोक कर आध्यात्मिक गतिविधियों से जुड़ना चाहिए. तब समस्या का हल प्राप्त हो जाएगा.

 

स्रोत- अभय चरणारविंद भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद (2014 संस्करण, अंग्रेजी), “श्रीमद् भागवतम्”, सातवाँ सर्ग, खंड 13- पाठ 27

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