“कामदेव के दस प्रभावों का वर्णन इस प्रकार किया गया है: चक्षु-रागः प्रथमं चित्संगस ततो’थ संकल्पः निद्रा-च्छेदस तनुता विषय-निवृत्तिस् त्रपा-नाशः/ उन्मादो मूर्च्छा मृतिर् इति एताः स्मर-दाशा दशैव स्युः. “”पहले आँखों से व्यक्त होने वाला आकर्षण आता है, फिर मन में तीव्र आसक्ति, फिर दृढ़ संकल्प, नींद की कमी, दुर्बल हो जाना, बाहरी चीजों से वैराग्य, निर्लज्जता, विक्षिप्तता, स्तब्ध होना और मृत्यु. ये कामदेव के प्रभाव के दस चरण हैं.””

श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती भी बताते हैं कि जिन भक्तों में भगवान का शुद्ध प्रेम होता है, वे सामान्यतः मृत्यु के लक्षण प्रदर्शित नहीं करते हैं, क्योंकि यह कृष्ण के संबंध में अशुभ है. यद्यपि, वे अन्य नौ लक्षणों को प्रकट करते हैं, जो परमानंद में निस्तब्ध होने में परिणीत होता है.”

स्रोत:अभय चरणारविंद भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद (2014 संस्करण, अंग्रेज़ी), श्रीमद् भागवतम्, दसवाँ सर्ग, अध्याय 42- पाठ 14

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