श्रील रूप गोस्वामी ने भक्ति सेवा के सर्वोत्तम ताने-बाने को अनुकूल्येण कृष्णानुशीलनम, या कृष्ण भावनामृत को अनुकूल रूप से विकसित करने के रूप में वर्णित किया है. कंस, निश्चित रूप से, कृष्ण के प्रति जागरूक था, किंतु चूँकि वह कृष्ण को अपना शत्रु मानता था, तो भले ही वह पूरी तरह से कृष्ण चेतना में लीन था, उसकी कृष्ण चेतना उसके अस्तित्व के लिए अनुकूल नहीं थी.अनुकूल रूप से विकसित कृष्णभावनामृत व्यक्ति को पूर्णतः सुखी बनाता है, इतना कि एक कृष्ण चैतन्य व्यक्ति कैवल्य-सुखम, या कृष्ण के अस्तित्व में विलीन होने को भी कोई महान लाभ नहीं समझता. कैवल्यं नरकायते. किसी कृष्ण चैतन्य व्यक्ति के लिए, कृष्ण, या ब्रह्म के अस्तित्व में विलय करना भी असहज होता है, जैसा कि निर्वैयक्तिकवादी करने की इच्छा रखते हैं. कैवल्यं नरकायते त्रिदशा-पुर आकाश-पुष्पयते. कर्मियों की लालसा स्वर्गीय ग्रहों में पदोन्नत होने केी रहती है, किंतु एक कृष्ण चैतन्य व्यक्ति इस तरह की पदोन्नति को इच्छा को व्यर्थ, किसी भी काज का नहीं, मानता है. दुर्दांतेंद्रिय-काल-सर्प-पातालि प्रोत्खात-दंशत्रयते. योगी अपनी इन्द्रियों को वश में करने का प्रयास करते हैं और इस प्रकार सुखी हो जाते हैं, लेकिन कृष्ण चैतन्य व्यक्ति योग विधियों की उपेक्षा करता है. वह महानतम शत्रुओं, इंद्रियों के प्रति उदासीन होता है, जिनकी तुलना सांपों से की जाती है. अनुकूल रूप से कृष्ण चेतना का विकास कर रहे किसी कृष्ण चैतन्य व्यक्ति के लिए, कर्मियों, ज्ञानियों और योगियों द्वारा कल्पित प्रसन्नता भी एक अंजीर से कम समझी जाती है.

स्रोत:अभय चरणारविंद भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद (2014 संस्करण, अंग्रेज़ी), श्रीमद् भागवतम्, दसवाँ सर्ग, अध्याय 2 – पाठ 24

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