यदि कोई व्यक्ति योग, आत्म-बोध में संलग्न है, और प्रक्रिया पूरी करने में असफल रहता है, तो उसे एक और अवसर दिया जाता है; उसे विशुद्ध ब्राम्हण या किसी समृद्ध व्यक्ति के परिवार में जन्म मिलता है. यदि कोई ऐसे परिवार में जन्म लेने के लिए पर्याप्त भाग्यशाली है, तो उसे आत्म-बोध के महत्व के समझने की सभी सुविधाएँ मिलती हैं. हमारे कृष्ण चैतन्य बच्चों के जीवन की शुरुआत से ही जाप और नृत्य करना सीखने का अवसर मिल रहा है, तो जब वे बड़े होंगे तो बदलेंगे नहीं, बल्कि स्वतः ही प्रगति करेंगे. वे बड़े भाग्यशाली हैं. एक बच्चा विकास करेगा यदि उसके पिता और माता भक्त हों, चाहे वह अमेरिका में जन्मा हो या यूरोप में. यदि कोई बच्चा भक्तों के परिवार में जन्म लेता है, तो उसका अर्थ है कि वह अपने पिछले जन्म में पहले ही योग की प्रक्रिया में आ चुका है, लेकिन किसी कारणवश वह उसे पूर्ण नहीं कर पाया था. इसलिए बच्चे को अच्छे पिता और माता के सानिध्य में प्रगति करने का एक और अवसर मिलता है. इस प्रकार से, कोई व्यक्ति भगवान चेतना का अपना विकास पूर्ण करता है, तब उसे इस भौतिक संसार में जन्म नहीं लेना पड़ता, बल्कि वह आध्यात्मिक संसार में वापस लौट जाता है.

अभय चरणारविंद स्वामी प्रभुपाद (2014 संस्करण, अंग्रेजी), “आत्म-साक्षात्कार का विज्ञान”, पृ. 157

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