अभिभावकीय देखभाल द्वारा, विभिन्न प्रकार के रोगों के उपचार द्वारा, और जल, वायु में और पृथ्वी पर सुरक्षा के साधनों के माध्यम से, भौतिक संसार में कष्ट से मुक्ति का प्रयास हमेशा रहता है, लेकिन उनमें से कोई भी सुरक्षा का निश्चित उपाय नहीं है. उनका लाभ अस्थायी रूप में हो सकता है, लेकिन उनका स्थायी लाभ नहीं होता. पिता और माता की उपस्थिति के बाद भी किसी बालक की दुर्घटनावश मृत्यु, रोग और विभिन्न अन्य कष्टों से सुरक्षा नहीं की जा सकती. माता-पिता सहित कोई भी सहायता नहीं कर सकता. अंततः भगवान ही शरण्य होते हैं, और जो भगवान की शरण लेता है सुरक्षित होता है. यह निश्चित है. जैसा कि भगवान भगवद्-गीता (9:31) में कहते हैं, कौंतेय प्रतिजानिः न मे भक्तः प्रनाश्यतिः “हे कुंतीपुत्र, निर्भय होकर घोषित करो कि मेरे भक्त कभी नष्ट नहीं होते.” इसलिए, जब तक कि व्यक्ति की सुरक्षा भगवान की दया से नहीं होती, कोई भी उपचार प्रभावी रूप से कार्य नहीं करता. व्यक्ति को फलतः भगवान की अहेतुक दया पर पूर्ण निर्भर होना चाहिए. यद्यपि सामान्य कर्तव्य के नाते व्यक्ति को निश्चित ही अन्य औपचारिक उपाय स्वीकार करने चाहिए, किंतु उसकी सुरक्षा कोई नहीं कर सकता जिसकी उपेक्षा भगवान के परम व्यक्तित्व द्वारा कर दी जाती है. इस भौतिक संसार में, हर कोई भौतिक प्रकृति के आक्रमण का प्रतिकार करने का प्रयास कर रहा है, लेकिन अंततः हर कोई भौतिक प्रकृति के पूर्ण नियंत्रण में होता है. इसलिए भले ही तथाकथित दार्शनिक और वैज्ञानिक भौतिक प्रकृति के दुष्प्रभाव पर विजय पाना चाहते हैं, किंतु ऐसा कर नहीं पाए हैं. कृष्ण भगवद्-गीता (13:9) में कहते हैं कि भौतिक प्रकृति के वास्तविक चार कष्ट –जन्म-मृत्यु जरा-व्याधि (जन्म, मृत्यु, वृद्धावस्था और रोग) हैं. संसार के इतिहास में, कोई भी भौतिक प्रकृति द्वारा उपजाए गए कष्टों पर विजय पाने में सफल नहीं हुआ है. प्राकृतेः क्रियामननि गुणैः कर्माणि सर्वषः. प्रकृति इतनी शक्तिशाली होती है कि कोई भी उसके कठिन नियमों पर विजय नहीं पा सकता. इसलिए तथाकथित वैज्ञानिक, दार्शनिक, धर्मशास्त्री और राजनीतिज्ञ अंत में यही कहते हैं कि वे सामान्य लोगों को सुविधाएँ नहीं दे सकते. उन्हें जनसंख्या को जगाने के लिए शक्तिशाली रूप से प्रचार करना चाहिए और उन्हें कृष्ण चेतना के स्तर तक ऊँचा उठाना चाहिए. सारे संसार में कृष्ण चेतना आंदोलन के प्रचार का हमारा विनम्र प्रयास ही एकमात्र उपचार है जो शांतिपूर्ण और प्रसन्न जीवन ला सकता है. हम परम भगवान (त्वद्-उपकेशितानाम्) की कृपा के बिना कभी सुखी नहीं हो सकते. यदि हम अपने परम पिता को अप्रसन्न करते रहे, तो हम इस भौतिक संसार में कभी भी सुखी नहीं होंगे, चाहे उच्चतर या निम्नतर ग्रह मंडलों कहीं भी हों.

 

स्रोत- अभय चरणारविंद भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद (2014 संस्करण, अंग्रेजी), “श्रीमद् भागवतम्”, सातवाँ सर्ग, खंड 09- पाठ 19

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