आत्मा (आत्मा या जीव) निश्चित ही शरीर से भिन्न होती है, जो कि पाँच भौतिक तत्वों का संयोजन होता है. यह एक सरल तथ्य है, किंतु यह समझ नहीं आता जब तक कि व्यक्ति आध्यात्मिक रूप से शिक्षित न हो. जीवों के विभिन्न श्रेणियाँ होती हैं, किंतु वे सभी न्यूनाधिक जीवन के शारीरिक अवधारणा के प्रभाव के अधीन होती हैं. दूसरे शब्दों में, इस भौतिक संसार में सभी जीव न्यूनाधिक आध्यात्मिक शिक्षा से वंचित रहते हैं. यद्यपि, वैदिक सभ्यता आध्यात्मिक शिक्षा पर आधारित है, और आध्यात्मिक शिक्षा के विशेष आधार पर ही भगवद्-गीता अर्जुन को कही गई थी. भगवद्-गीता के प्रारंभ में, कृष्ण ने अर्जुन को निर्देश दिया था कि आत्मा शरीर से भिन्न होती है.

देहिनोस्मिन यथा देहे कौमारम् यौवनम् जरा
तथा देहांतर-प्राप्तिर धीरस् तत्र न मुह्यति

“जैसे अंतर्निहित आत्मा इस शरीर में बालकवय से युवावस्था, फिर उससे वृद्धावस्था में निरंतर जाती रहती है, उसी समान आत्मा मृत्यु होने पर दूसरे शरीर में चले जाती है. स्व-अनुभूत आत्मा इस प्रकार के परिवर्तन से व्यग्र नहीं होती.” (भगी. 2.13) दुर्भाग्यवश, यह आध्यात्मिक शिक्षा आधुनिक मानव सभ्यता में पूर्णतः अनुपस्थित है. कोई भी अपना वास्तविक आत्म-हित नहीं समझता, जो कि आत्मा के साथ निहित होता है, न कि भौतिक शरीर के साथ. शिक्षा का अर्थ है आध्यात्मिक शिक्षा. जीवन की शारीरिक धारणा में बिना आध्यात्मिक शिक्षा के, कड़ा परिश्रम करना पशु के समान जीवन जीना है. नयम् देहो देह-भजम् नृ-लोक कष्टन कामन अर्हते विद्-भुजम् ये (भाग. 5.5.1). लोग आत्मा के संबंध में शिक्षा के बिना, बस शारीरिक सुखों के लिए कठिन श्रम कर रहे हैं. अतः वे बहुत जोखिम भरी सभ्यता में जी रहे हैं, क्योंकि यह तथ्य है कि आत्मा को एक शरीर से दूसरे शरीर में स्थानांतरित होना पड़ता है (तथा देहांतर-प्राप्तिः). बिना आध्यात्मिक शिक्षा के, लोग अंधेरे अज्ञान में रखे गए हैं और नहीं जानते कि वर्तमान शरीर के विनाश के बाद उनके साथ क्या होगा. वे अंधत्व में कार्यरत हैं, और अंधे नेता ही उनका नेतृत्व कर रहे हैं. अंध यथांधैर उपनियमनस् ते पिस-तंत्र्यम उरु-दम्नि बद्धः (भाग. 7.5.31). एक मूर्ख व्यक्ति नहीं जानता कि वह पूरी तरह भौतिक प्रकृति के बंधन में है और मृत्यु के बाद भौतिक प्रकृति उस पर एक विशिष्ट प्रकार का शरीर थोप देगी, जिसे उसे स्वीकार करना होगा. वह नहीं जानता कि भले ही उसके वर्तमान शरीर में वह एक महत्वपूर्ण व्यक्ति रहा हो, कि भौतिक प्रकृति की अवस्था में उसकी अज्ञानी गतिविधियों के कारण अगली बार उसे किसी पशु या पेड़ का शरीर मिल सकता है. इसलिए कृष्ण चेतना आंदोलन समस्त जीवों को आध्यात्मिक अस्तित्व का सच्चा प्रकाश देने का प्रयास कर रहा है. इस आंदोलन को समझना बहुत कठिन नहीं है, और लोगों को इसका लाभ लेना ही चाहिए, क्योंकि यह उन्हें अनुत्तरदायित्व के जोखिम भरे जीवन से बचाएगा.

स्रोत – अभय चरणारविंद स्वामी प्रभुपाद (2014 संस्करण, अंग्रेज़ी), “श्रीमद् भागवतम्” , आठवाँ सर्ग, अध्याय 16 – पाठ 19

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