“मुक्ति या मुक्ति के पथ पर सुधार के लिए दस प्रक्रियाएँ भक्तों के लिए अभीष्ट नहीं होती हैं. केवल्य भक्त्य: यदि व्यक्ति केवल भगवान की भक्ति सेवा में रत हो जाए, तो मुक्ति की सभी दस विधियाँ स्वतः ही संपन्न हो जाती हैं. प्रह्लाद महाराज का प्रस्ताव है कि ऐसी प्रक्रियाएँ अजितेंद्रिय के लिए सुझाई जा सकती हैं, वे जो अपनी इंद्रियों पर विजय नहीं पा सकते. सर्वोपधि-विनिर्मुक्तम तत्-परत्वेन निर्मलम : एक भक्त भौतिक दूषण से पहले से ही मुक्त होता है. श्रील भक्तिसिद्धांत सरस्वती ठाकुर ने इसीलिए कहा है:

दुष्ट मना ! तुमि किसेरा वैष्णव?
प्रतिष्ठारा तारे, निर्जनेर घरे,
तव हरि-नाम केवल कैतव

ऐसे कई हैं जो हरे कृष्ण मंत्र का जाप मौन, एकांत स्थान में करना पसंद करते हैं, लेकिन यदि व्यक्ति प्रचार में रुचि नहीं रखता, लगातार अभक्तों से बातचीत करता है, तो प्रकृति के गुणों के प्रभाव से पार पाना अत्यंत कठिन होता है. इसलिए जब तक कोई कृष्ण चेतना में बहुत प्रगति न कर ले, उसे हरिदास ठाकुर की नकल नहीं करनी चाहिए, जिन्हें सदैव, दिन के चौबीसों घंटे पवित्र नाम के जाप करने के अतिरिक्त कोई अन्य कार्य नहीं था. प्रह्लाद महाराज ऐसी प्रक्रिया की निंदा नहीं करते; वे उसे स्वीकार करते हैं, किंतु भगवान की सक्रिय सेवा के बिना, केवल ऐसी विधियों से व्यक्ति सामान्यतः मुक्ति नहीं पा सकता. केवल झूठे गर्व से व्यक्ति मुक्ति नहीं पा सकता. ”

 

स्रोत- अभय चरणारविंद भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद (2014 संस्करण, अंग्रेजी), “श्रीमद् भागवतम्”, सातवाँ सर्ग, खंड 09- पाठ 46

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