भगवद्-गीता (4.11) में ऐसा कहा गया है, ये यथा प्रपद्य़ंते तम तथैव भजाम्य अहम् : भगवान के परम व्यक्तित्व ही परम न्यायकर्ता हैं जो विभिन्न व्यक्तियों को अपने चरण कमलों में उसके समर्पण के अनुसार पुरस्कृत या दंडित करते हैं. इसलिए वास्तव में ऐसा देखा जा सकता है कि भले ही कर्मी और भक्त समान स्थान पर, एक ही समय में, समान ऊर्जा, और समान महात्वाकांक्षा के साथ कार्य कर सकते हैं, किंतु उन्हें भिन्न परिणाम मिलते हैं. कर्मी जन्म और मृत्यु के चक्र में विभिन्न शरीरों में स्थानांतरित होते रहते हैं, कभी-कभी ऊपर की ओर और कभी नीचे की ओर, इस प्रकार कर्म-चक्र, जन्म और मृत्यु के चक्र में उनके कर्मों का परिणाम भुगतते हैं. जबकि भक्त, भगवान के चरण कमलों में पूर्ण समर्पित होकर, अपने प्रयासों में कभी व्याकुल नहीं होते, भले ही वे लगभग कर्मियों के समान ही कार्य करते हैं, भक्त वापस घर, परम भगवान के पास लौटते हैं, और प्रत्येक प्रयास में सफलता प्राप्त करते हैं. दैत्यों या नास्तिकों को स्वयं अपने प्रयासों में विश्वास होता है, किंतु भले ही वे दिन रात कड़ा परिश्रम करें, उन्हें अपने भाग्य से अधिक कुछ नहीं मिलता. यद्यपि भक्त कर्म की प्रतिक्रियाओं से पार जा सकते हैं और आश्चर्यजनक परिणाम प्राप्त कर सकते हैं, बिना प्रयास के भी. ऐसा भी कहा जाता है, फलेन परिचियते : किसी भी गतिविधि में व्यक्ति की सफलता या पराजय को उसके परणाम से समझा जाता है. भक्तों की पोषाक में कई कर्मी होते हैं, किंतु भगवान का परम व्यक्तित्व उनके उद्देश्य को भाँप सकता है. कर्मी उनकी स्वार्थी इंद्रिय संतुष्टि के लिए भगवान की संपत्ति का उपयोग करना चाहते हैं. इसलिए एक भक्त कर्मियों से हमेशा अलग होता है, भले ही कर्मी भक्त के समान वेष धर सकते हैं. जैसा कि भगवद्-गीता (3.9) में पुष्टि की गई है, यज्ञार्थात कर्मणोन्यत्र लोको यम कर्म-बंधनः. वह जो भगवान विष्णु के लिए कार्य करता है वह इस भौतिक संसार से मुक्त होता है, और अपने शरीर को त्यागने के बाद वह वापस घर, परम भगवान तक वापस जाता है. यद्यपि, एक कर्मी ऊपरी रूप से किसी भक्त के समान कार्य करता हो, अपनी अभक्तिमय गतिविधियों में फंसा रहता है, औऱ इस प्रकार वह भौतिक अस्तित्व का झांझावात भोगता है. इसलिए कर्मियों और भक्तों द्वारा अर्जित किए गए परिणामों से, व्यक्ति भगवान के परम व्यक्तित्व की उपस्थिति को समझ सकता है, जो कर्मियों और ज्ञानियों के लिए भक्तों की अपेक्षा भिन्न व्यवहार करते हैं. इसलिए श्री चैतन्यचरितामृत के लेखक कहते हैं:

कृष्ण भक्त—-निष्काम, अतएव ‘संत’
भुक्ति-मुक्ति-सिद्धि-कामी—-सकली ‘असंत’

कर्मी जो इंद्रिय तुष्टि की इच्छा रखते हैं, ज्ञानी जो परम के अस्तित्व में विलीन होने की मुक्ति की कामना करते हैं, और योगी जो रहस्यमयी शक्ति में भौतिक सफलता खोजते हैं, सभी अधीर होते हैं और अंततः वे विस्मित हो जाते हैं. किंतु भक्त, जो कोई भी व्यक्तिगत लाभ नहीं चाहते और जिनकी एकमात्र महत्वाकांक्षा भगवान के परम व्यक्तित्व की महिमा को प्रसार करना होता है, वे कठिन परिश्रम के बिना ही, भक्ति-योग के मंगल परिणामों का वरदान पाते हैं.

स्रोत – अभय चरणारविंद स्वामी प्रभुपाद (2014 संस्करण, अंग्रेज़ी), “श्रीमद् भागवतम्” , आठवाँ सर्ग, अध्याय 9 – पाठ 28

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