“भक्ति-रसामृत-सिंधु में नित्य सिद्ध और साधना-सिद्ध भक्तों के बारे में विचारणीय चर्चा दी गई है. नित्य-सिद्ध भक्त वैकुंठ से इस भौतिक संसार में अपने व्यक्तिगत उदाहरण द्वारा या शिक्षा देने हेतु आते हैं कि भक्त कैसे बनें. इस भौतिक संसार में जीव ऐसे नित्य सिद्ध भक्तों से शिक्षा ले सकते हैं और इस प्रकार वापस परम भगवान के पास, घर लौटने को उन्मुख बन सकते हैं. नित्य सिद्ध भक्त वैकुंठ से भगवान के परम व्यक्तित्व के आदेश पर आता है और अपने उदाहरण द्वारा बताता है कि शुद्ध भक्त (अन्यभिलाषित-शून्यम्) कैसे बनें. इस भौतिक संसार में आने पर भी, नित्य सिद्ध भक्त कभी भी भौतिक भोग के प्रलोभन से आकर्षित नहीं होता. एक श्रेष्ठ उदाहरण प्रह्लाद महाराज हैं, जो एक नित्य सिद्ध, महा-भगवत भक्त थे. यद्यपि प्रह्लाद का जन्म हिरण्यकशिपु, एक नास्तिक के परिवार में हुआ था, तब भी वे किसी भी प्रकार के भौतिक भोग से कभी आसक्त नहीं हुए.

एक शुद्ध भक्त के लक्षण प्रदर्शित करने की इच्छा से, भगवान ने प्रह्लाद महाराज को भौतिक वरदान लेने के लिए प्रेरित करने का प्रयास किया, किंतु प्रह्लाद महाराज ने उन्हें स्वीकार नहीं किया. इसके विपरीत, अपने व्यक्तिगत उदाहरण द्वारा उन्होंने एक शुद्ध भक्त के लक्षण दिखाए. दूसरे शब्दों में, अपने शुद्ध भक्तों को इस भौतिक संसार में भेजने की इच्छा स्वयं भगवान नहीं करते, न ही किसी भक्त का यहाँ आने का कोई भौतिक उद्देश्य होता है. जब भगवान स्वयं इश भौतिक संसार में अवतार के रूप में प्रकट होते हैं, तो वे भौतिक वातावरण से आकर्षित नहीं होते, और उन्हें भौतिक गतिविधियों से कुछ लीजे-दीजे नहीं होता, फिर भी वे अपने उदाहरण से सामान्य मानव को शिक्षा देते हैं कि कैसे एक भक्त बना जाए. उसी प्रकार, एक भक्त जो परम भगवान के आदेशानुसार यहाँ आता है, अपने व्यक्तिगत व्यवहार द्वारा दिखाता है कि एक शुद्ध भक्त कैसे बनते हैं. इसलिए, एक शुद्ध भक्त, भगवान ब्रम्हा सहित सभी जीवों के लिए एक व्यावहारिक उदाहरण होता है. ”

 

स्रोत- अभय चरणारविंद भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद (2014 संस्करण, अंग्रेजी), “श्रीमद् भागवतम्”, सातवाँ सर्ग, खंड 10- पाठ 03

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