कलि के इस युग में संसार के लोग हमेशा चिंतित रहते हैं. सभी लोग किसी प्रकार के रोग से ग्रस्त हैं. इस युग के लोगों के मुख से ही, व्यक्ति मन के संकेत का पता लगा सकता है. सभी लोग घर से दूर अपने संबंधी की अनुपस्थिति का अनुभव करते हैं. कलियुग का एक विशेष लक्षण है कि कोई भी परिवार साथ रहने के लिए अनुग्रहित नहीं है. जीविकोपार्जन के लिए पिता अपने पुत्र से किसी दूरस्थ स्थान पर रहता है, या पत्नी अपने पति से बहुत दूर रहती है आदि. आंतरिक रोगों की पीड़ा, अपने सगे संबंधियों और प्रियजनों से अलगाव, और प्रतिष्ठा बनाए रखने की चिंताएँ हैं. यही सब महत्वपूर्ण घटक हैं जो इस युग के लोगों को सदैव अप्रसन्न रखते हैं. कलियुग की प्रगति के साथ, विशेषकर चार बातें, जीवन की अवधि, दया, स्मरण शक्ति, और नैतिक या धार्मिक सिद्धांत, धीरे-धीरे लुप्त हो रही हैं. चूँकि धर्म, या धर्म के सिद्धांत, चार में से तीन के अनुपात में लुप्त हो जाएंगे, प्रतीकात्मक बैल केवल एक पैर पर खड़ा था. जब समस्त संसार की तीन चौथाई जनसंख्या अधार्मिक हो जाएगी तब पशुओं के लिए परिस्थिति नर्क जैसी हो जाएगी. कलियुग में, भगवानहीन सभ्यता कई सारे तथा-कथित धार्मिक समाज की रचना कर लेगी जिनमें भगवान के परम व्यक्तित्व प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से अवहेलना की जाएगी. और इस प्रकार मानवों के आस्थाहीन समाज स्वस्थचित्त लोगों के समूह के लिए निवास के लिए इस संसार को अनुपयुक्त बना देंगे. भगवान के परम व्यक्तित्व में आनुपातिक आस्था के संदर्भ में मानव के वर्गीकरण हैं. प्रथम श्रेणी के आस्थावान पुरुष वैष्णव और ब्राह्मण हैं, फिर क्षत्रिय, फिर वैश्य, फिर शूद्र, फिर म्लेच्छ, यवन और सबसे अंतिम चांडाल होते हैं. मानव वृत्ति का ह्रास म्लेच्छों से प्रारंभ होता है, और जीवन की चांडाल अवस्था मानवीय ह्रास की अंतिम स्थिति है. वैदिक साहित्य में उल्लिखित सभी उक्त शब्द किसी विशेष समुदाय या जन्म के लिए कभी नहीं थे. वे सामान्य रूप से मनुष्यों की विभिन्न योग्यताएं हैं. जन्मसिद्ध अधिकार या समुदाय का कोई प्रश्न नहीं है. व्यक्ति अपने स्वयं के प्रयासों से संबंधित योग्यता प्राप्त कर सकता है, और इस प्रकार वैष्णव का पुत्र म्लेच्छ भी बन सकता है, या चांडाल का पुत्र ब्राह्मण से भी उच्च हो सकता है, सभी परम भगवान के साथ अपनी संगति और अंतरंग संबंध के संदर्भ में. मांसाहारियों को सामान्यतः म्लेच्छ कहा जाता है. लेकिन मांसाहारी म्लेच्छ नहीं होते. जो लोग मांस को शास्त्रों के अनुसार स्वीकार करते हैं वे म्लेच्छ नहीं होते, लेकिन जो किसी भी प्रतिबंध के बिना मांस स्वीकार करते हैं उन्हें म्लेच्छ कहा जाता है. गौमांस शास्त्रों में प्रतिबंधित है, और वेदों के अनुयायिओं द्वारा बैलों और गायों को विशेष सरंक्षण दिया जाता है. लेकिन इस कलियुग में, लोग बैल और गाय के शरीर का मनचाहा शोषण करेंगे, और इस प्रकार वे विभिन्न प्रकार के कष्टों को आमंत्रित करेंगे. इस युग के लोग कोई भी त्याग नहीं करेंगे. म्लेच्छ जनसंख्या त्यागों के लिए बहुत कम चिंता करेगी, यद्यपि त्याग करना उन लोगों के लिए आवश्यक है जो भौतिक रूप से इंद्रिय भोग में रत होते हैं. भगवद्-गीता में त्याग करने पर बहुत बल दिया गया है (भ.गी. 3.14-16). जीवों की रचना, रचनाकार ब्रम्हा द्वारा की जाती है, और केवल निर्मित जीवों के वापस परम भगवान की ओर प्रगतिशील पालन के लिए ही, त्याग करने की प्रणाली भी उन्हीं के द्वारा बनाई गई है. व्यवस्था यह है कि जीव अन्न और शाकों की उपज पर जीवित रहते हैं, और इस प्रकार का भोजन करके वे रक्त और वीर्य के रूप में शरीर का आवश्यक बल पाते हैं, और रक्त और वीर्य से एक जीव अन्य जीवों कि रचना करने में सक्षम होता है. लेकिन अन्न और शाक, इत्यादि का उत्पादन वर्षा द्वारा संभव होता है, और उचित रूप से वर्षा के लिए सुझाई गई बलियाँ होती हैं. इस प्रकार के बलिदान सामवेद, यजुर्वेद, ऋग्वेद, और अथर्ववेद नाम के वेदों के संस्कारों द्वारा निर्दिष्ट होते हैं. मनु-स्मृति में सुझाया गया है कि अग्नि के वेदी पर बलि देने से सूर्य भगवान प्रसन्न होते हैं. जब सूर्यदेव प्रसन्न होते हैं, तो वे समुद्र से समुचित मात्र में जल एकत्र करते हैं, और इस प्रकार क्षितिज पर पर्याप्त मेघ एकत्रित होते हैं और वर्षा होती है. पर्याप्त जलवृष्टि के बाद, सभी मानवों और पशुओं के लिए अन्न का पर्याप्त उत्पादन होता है, और इस प्रकार प्राणियों में विकासशील गतिविधियों के लिए ऊर्जा आती है. यद्यपि, म्लेच्छ अन्य पशुओं के साथ ही बैलों और गायों के वध के लिए वधशालाएँ बनाने की योजना बनाते हैं. यह सोच कर कि वे कारखानों की संख्या बढ़ाकर और बिना बलि या अन्न के उत्पादन की चिंता किए, समृद्ध होंगे. लेकिन उन्हें पता होना चाहिए कि पशुओं के लिए भी उन्हें घास और शाकों का उत्पादन करना होगा, अन्यथा पशु जीवित नहीं रह सकते हैं. और पशुओं के लिए घास का उत्पादन करने के लिए, उन्हें पर्याप्त वर्षा की आवश्यकता होती है. इसलिए उन्हें अतंतः सूर्य-देव, इंद्र और चंद्र जैसे देवताओं की दया पर निर्भर होना पड़ेगा, औऱ ऐसे देवताओं को बलि से संतुष्ट किया जाना आवश्यक है. यह भौतिक संसार एक प्रकार का कारागृह है, जैसा कि हमने कई बार बताया है. देवता भगवान के सेवक हैं जो इस कारावास के उचित रख-रखाव का ध्यान रखते हैं. ये देवता देखना चाहते हैं कि उन विद्रोही जीवों को धीरे-धीरे भगवान की परम शक्ति की ओर उन्मुख किया जाए, जो आस्थाहीन रूप से जीवित रहना चाहते हैं. इसलिए, शास्त्रों में बलि करने का सुझाव दिया गया है. भौतिकवादी पुरुष इन्द्रिय भोग के लिए कठिन परिश्रम करना चाहते हैं और फलदायक परिणाम प्राप्त करना चाहते हैं. इस प्रकार वे जीवन के प्रत्येक चरण पर वे हर प्रकार के पाप कर रहे हैं. यद्यपि, जो सचेत रूप से प्रभु की भक्ति सेवा में लगे रहते हैं, पाप और पुण्य के सभी प्रकारों के परे होते हैं. उनकी गतिविधियाँ भौतिक प्रकृति की तीन अवस्थाओं के प्रदूषण से मुक्त होती हैं. भक्तों के लिए सुझाए हुए बलिदानों की कोई आवश्यकता नहीं होती क्योंकि भक्त का जीवन ही बलि का प्रतीक होता है. लेकिन जो लोग इंद्रिय सुख के लिए फलदायी गतिविधियों में लगे होते हैं उन्हें निर्दिष्ट बलियां करनी होती हैं क्योंकि फलदायी कार्य करने वालों द्वारा किए गए सभी पापों की प्रतिक्रियाओं से मुक्त होने का एकमात्र साधन यही है. बलिदान ऐसे संचित पापों का प्रतिकार करने का साधन होता है. जब ऐसी बलियाँ दी जाती हैं तो देवता प्रसन्न होते हैं, वैसे ही जैसे कारागृह के अधिकारी संतुष्ट हो जाते हैं जब बंदी आज्ञाकारी कर्ताओं में बदल जाते हैं. भगवान चैतन्य, यद्यपि, केवल एक यज्ञ, या बलिदान का सुझाव दिया है, जिसे संकीर्तन यज्ञ, हरे कृष्ण का जाप, कहते हैं, जिसमें हर कोई भाग ले सकता है. अतः भक्त और फल के अभिलाषी कार्यकर्ता दोनों ही संकीर्तन-यज्ञ के निष्पादन से समान लाभ ले सकते हैं. नीच पशुओं के साथ जीवन की कुछ समान आवश्याकताएँ होती हैं, और वे खा रहे हैं, सो रहे हैं, डर रहे हैं और संभोग कर रहे हैं. ये शारीरिक आवश्यकताएँ पशुओं औऱ मानवों दोनों के लिए होती हैं. लेकिन मानव को इन आवश्यकताओं की पूर्ति पशुओं के जैसे नहीं, बल्कि मानवों के जैसे करनी होती है. एक कुत्ता सार्वजनिक रूप से किसी कुतिया के साथ निस्संकोच संसर्ग कर सकता है, लेकिन यदि कोई मनुष्य ऐसा करता है तो उस कृत्य को सार्वजनिक विघ्न माना जाएगा, और उस व्यक्ति पर आपराधिक प्रकरण बनाया जाएगा. इसलिए मनुष्यों के लिए सामान्य आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए भी कुछ नियम और विनियम होते हैं. मानव समाज जब कलियुग से प्रभावित होता है तो ऐसे नियमों को टालता है. इस युग में, लोग जीवन की ऐसी आवश्यकताओं की पूर्ति में नियम और विनियमों का पालन किए बिना रत रहते हैं, और ऐसे पाशविक व्यवहार के हानिकारक प्रभाव के कारण सामाजिक और नैतिक नियमों की यह गिरावट निश्चित रूप से शोचनीय है. इस युग में, पिता और अभिभावक अपने बच्चों के व्यवहार से प्रसन्न नहीं हैं. उन्हें ज्ञात होना चाहिए कि उनके अबोध बच्चे इस कलियुग के प्रभाव से उपजी बुरी संगत से पीड़ित हैं. हम श्रीमद्-भागवतम् से जानते हैं कि एक ब्राम्हण का अबोध पुत्र, अजामिल जब सड़क पर जा रहा था और उसने एक शूद्र युगल को कामुक रूप से संसर्ग करते देख लिया. इस कृत्य ने बालक को आकर्षित किया, और बाद में बालक समस्त व्याभिचारों का शिकार बना. एक विशुद्ध ब्राम्हण से, वह एक अधम दुष्ट की अवस्था में पतित हो गया, और यह सब कुसंगति के कारण हुआ. उन दिनों में केवल अजामिल जैसा ही शिकार हु्आ था, लेकिन इस कलियुग में बेचारे अबोध विद्यार्थी प्रतिदिन सिनेमा के शिकार बनते हैं जो पुरुषों को केवल यौन आसक्ति की ओर आकर्षित करता है. तथाकथित प्रशासक क्षत्रिय के व्यवहार के प्रति अशिक्षित हैं. क्षत्रिय प्रशासन के लिए होते हैं, जैसे कि ब्राम्हण ज्ञान और मार्गदर्शन के लिए होते हैं. क्षत्र-बंधु शब्द का आशय प्रशासकों या उन व्यक्तियों से होता है जिन्हें सांस्कृतिक और परंपरा के किसी उचित प्रशिक्षण के बिना ही प्राशासनिक पद पर पदोन्नत कर दिया जाता है. आजकल उन्हें ऐसे उच्च पदों पर ऐसे लोगों के मत से पदोन्नत कर दिया जाता है जो जीवन के नियमों और विनियमों के प्रसंग में स्वयं पतित हैं. ऐसे लोग किस प्रकार एक उचित व्यक्ति का चयन कर सकते हैं जब वे स्वयं ही जीवन के मानकों में पतित हों? इसलिए, कलियुग के प्रभाव से, सभी ओर, राजनीतिक, सामाजिक या धार्मिक स्तर पर सभी कुछ उलट-पुलट है, औऱ इसलिए सचेत व्यक्ति के लिए यह सब खेदजनक है. कलियुग की प्रगति के साथ, लोग बहुत अहंकारी बन रहे हैं, और स्त्रियों तथा नशे पर आसक्त हो रहे हैं. कलियुग के प्रभाव से, एक दरिद्र भी अपने एक पैसे पर अहंकार रखता है, स्त्रियाँ पुरुषों के मन को शिकार बनाने के लिए हमेशा अत्यधिक भड़कीले वस्त्र पहने रहती हैं, और पुरुष मदिरा पीने, धुम्रपान करने, चाय पीने और तंबाखू चबाने इत्यादि के व्यसन में है. ये सभी आदतें, या सभ्यता की तथा-कथित प्रगति ही सभी अधार्मिकताओं का मूल कारण हैं, और इसलिए भ्रष्टाचार, रिश्वतखोरी और भाई-भतीजावाद पर रोक लगाना असंभव है. मनुष्य बस वैधानिक कार्यवाहियों और पुलिस की पहरेदारी से इन सभी बुराइयों पर नियंत्रण नहीं कर सकता, लेकिन वह उचित औषधि से मन के रोग का उपचार कर सकता है, जैसे ब्राम्हण संस्कृति या आत्मसंयम, स्वच्छता, दया और सच्चाई. आधुनिक स्भ्यता और आर्थिक विकास ग्राहक की वस्तुओं का भयादोहन के परिणाम के साथ निर्धनता और अभाव की नयी परिस्थिति को जन्म दे रहे हैं. यदि समाज के नेता और संपन्न व्यक्ति अपनी सिंचित संपत्ति का पचास प्रतिशत पथभ्रष्ट लोगों के लिए दया के साथ व्यय करें और उन्हें भगवान की चेतना, भागवतम के ज्ञान, की शिक्षा दें, तो निश्चित ही बद्ध आत्माओं को जाल में लेने के प्रयास में कलियुग हार जाएगा. हमें हमेशा याद रखना चाहिए कि झूठा अहंकार, या जीवन मूल्यों के बारे में व्यक्ति का अपना बहुत ऊँचा आकलन, स्त्रियों के प्रति या उनकी संगति की अनुचित आसक्ति, और नशा मानव सभ्यता को शांति के पथ से विलग कर देगा, यद्यपि लोग शांति के लिए कितना भी शोर मचा लें. भागवतम् के सिद्धांतों का उपदेश स्वतः ही सभी व्यक्तियों को सादगीपूर्ण, आंतरिक और बाह्य रूप से निर्मल, कष्टों के प्रति दयावान, और दैनिक व्यवहार में सच्चा बनाएगा. यही मानव समाज की त्रुटियों को ठीक करने का ढंग है, जो कि वर्तमान क्षण में बहुत प्रमुखता से प्रदर्शित हैं.

अभय चरणारविंद स्वामी प्रभुपाद (2014 संस्करण, अंग्रेजी), “श्रीमद् भागवतम्”, प्रथम सर्ग, अध्याय 16- पाठ 19, 20 व 22

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