चूँकि भौतिक संसार कृष्ण चेतना में प्रगति के लिए बाधाओं से भरा हुआ है, ऐसा लग सकता है कि बहुत से व्यवधान हैं, फिर भी कृष्ण, भगवान के परम व्यक्तित्व, भगवद्-गीता (9.31) में घोषित करते हैं, कौंतेय प्रतिजानिहि न मे भक्तः प्रनाश्यति: जब कोई भगवान के चरण कमलों में शरण ले लेता है, वह भटक नहीं सकता. आध्यात्मिक पथ इतना मंगल होता है कि एक भक्त किसी भी स्थिति में नहीं खो सकता. ऐसा भगवद्-गीता में स्वयं भगवान द्वारा बताया गया है पार्थ नैवेह नमुत्र विनाशस् तस्य विद्यते: “मेरे प्रिय अर्जुन, एक भक्त के लिए भटक जाने का कोई प्रश्न नहीं उठता, इस जीवन में या अगले जन्म में.” (भगी. 6.40) भगवद्-गीता (6.43) में भगवान स्पष्ट रूप से बताते हैं कि ऐसा किस प्रकार है. यत्र तम बुद्धि-संयोगम् लभते पौर्व-देहिकम् यतते च ततो भूयः समसिद्धौ कुरु-नंदन भगवान के आदेश पर, एक संपूर्ण भक्त कभी-कभी एक सामान्य मानव के समान इस भौतिक संसार में आता है. उसके पिछले अभ्यास के कारण, ऐसा संपूर्ण भक्त सहज ही भक्ति सेवा पर आसक्त हो जाता है, स्पष्ट रूप से बिना किसी हेतु के. आस-पास के वातावरण के कारण सभी प्रकार की बाधाओं के बावजूद, वह स्वतः ही भक्ति सेवा में नियमित रहता है और धीरे-धीरे प्रगति करता है जब तक कि वह फिर से संपूर्ण न बन जाए. बिल्वमंगल ठाकुर अपने पूर्व जीवन में एक उन्नत भक्त थे, लेकिन अगले जन्म में वह बहुत पतित हो गए और वेश्याओं पर आसक्त हो गए. अचानक, यद्यपि, उश वेश्या के शब्दों से उनका संपूर्ण व्यवहार बदल गया था, जिसने उन्हें बहुत आसक्त बनाया था, और वे एक महान भक्त बने. उच्च स्तर के भक्तों के जीवन में, ऐसे कई उदाहरण होते हैं, जो प्रमाणित करते हैं कि जब कोई भगवान के चरण कमलों में शरण ले लेता है, तो वह भटक नहीं सकता (कौंतेय प्रतिजानिहि न मे भक्तः प्रनाश्यति).

अभय चरणारविंद स्वामी प्रभुपाद (2014 संस्करण, अंग्रेजी), “श्रीमद् भागवतम्”, पंचम सर्ग, अध्याय 01- पाठ 05

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