“ये सभी मानवों द्वारा पालन करने योग्य सामान्य सिद्धांत हैं : सच्चाई, दया, तप (महीने के विशेष दिनों में उपवास रखना), दिन में दो बार स्नान करना, सहनशीलता, उचित और अनुचित के बीच भेद करना, मन पर नियंत्रण, अहिंसा, ब्रम्हचर्य, दान, शास्त्रों का पाठ, सरलता, संतुष्टि, संत व्यक्तियों की सेवा करना, अनावश्यक अवलंबनों से धीरे-धीरे छुटकारा पाना, मानव समाज की अनावश्यक गतिविधियों का अवलोकन करना, मौन रहना और अनावश्यक वार्तालाप से बचना, विचार करना कि व्यक्ति शरीर है या आत्मा, सभी जीवों को बराबरी से भोजन बाँटना (मानव और पशु दोनों), हर आत्मा (विशेषकर मानव रूप में) को परम भगवान के अंश के रूप में देखना, भगवान के परम व्यक्तित्व (जो संत व्यक्तियों के शरण हैं) की गतिविधियों और उनके निर्देशों के बारे में श्रवण करना, इन गतिविधियों और निर्देशों के बारे में जप करना, हमेशा इन गतिविधियों और निर्देशों को याद रखना, सेवा करने का प्रयास करना, पूजा करना, आज्ञापालन करना, एक सेवक बनना, एक मित्र बनना, और स्वयं के संपूर्ण आत्म को समर्पित कर देना. हे राजा युधिष्ठिर, इन तीस योग्यताओं को जीवन के मानव रूप में अवश्य अर्जित करना चाहिए. बस इन योग्यताओं को अर्जित करके, व्यक्ति भगवान के परम व्यक्तित्व को संतुष्ट कर सकता है.

मानव के पशु से भिन्न होने के क्रम में, महान संत नारद सुझाव देते हैं कि प्रत्येक मानव को ऊपर-वर्णित तीस योग्यताओं के संबंध में शिक्षित किया जाना चाहिए. आजकल संसार भर में, हर कहीं धर्मनिरपेक्ष राज्य, के लिए प्रचार है, ऐसा राज्य जो केवल अतिसाधारण गतिविधियों में रुचि रखता है. किंतु यदि राज्य के नागरिकों को उपरोक्त अच्छे गुणों की शिक्षा नहीं दी गई, तो सुख कैसे होगा? उदाहरण के लिए, यदि पूरी जनसंख्या असत्यमय हो, तो राज्य सुखी कैसे होगा? इसलिए, व्यक्ति के विधर्मी होने का विचार किए बिना, चाहे हिंदू, मुस्लिम, क्रिश्चियन, बौद्ध या कोई भी पंथ का हो, सभी को सच्चा होने की शिक्षा देनी चाहिए. उसी प्रकार, प्रत्येक व्यक्ति को दयावान होना सिखाना चाहिए, और हर किसी को महीने के विशेष दिनों में उपवास रखना चाहिए. सबको दिन में दो बार स्नान करना चाहिए, दाँत और बाहर से शरीर को निर्मल करना चाहिए, और अंदर से मन को भगवान के पवित्र नाम का स्मरण करके निर्मल करना चाहिए. भगवान है, चाहे व्यक्ति हिंदू, मुस्लिम या क्रिश्चियन हो. इसलिए, व्यक्ति को भाषाई उच्चारणों में अंतर होने के बावजूद भी, भगवान के पवित्र नाम का जाप करना चाहिए. साथ ही, सभी को इस बारे में बहुत सावधान रहने की शिक्षा देनी चाहिए कि अनावश्यक वीर्यपात न किया जाए, व्यक्ति स्मृति, दृढ़निश्चय, गतिविधि में और अपनी शारीरिक ऊर्जा की जीवन शक्ति में अत्यंत शक्तिशाली बन जाता है. सभी को विचार और भावना में सरल बनने और शरीर और मन में संतुष्ट रहने की शिक्षा भी देनी चाहिए. ये मानव की सामान्य योग्यताएँ हैं. एक धर्मनिरपेक्ष या गिरजाघर आधारित राज्य की कोई आवश्यकता नहीं है. जब तक कि व्यक्ति को उपरोक्त तीस गुणों की शिक्षा नहीं दी जाती, शांति नहीं हो सकती. ”

 

स्रोत- अभय चरणारविंद भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद (2014 संस्करण, अंग्रेजी), “श्रीमद् भागवतम्”, सातवाँ सर्ग, खंड 11- पाठ 08-12

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