भगवद्-गीता में कहा गया है कि मृत्यु के समय व्यक्ति उन विचारों में खो जाएगा जो उसने जीवन भर की अवधि में पोषित किए हैं. कोई व्यक्ति जिसका अपने परिवार के सदस्यों का उचित रूप से पालन करने के अतिरिक्त कोई भी विचार नहीं रहा हो उसके अंतिम विचार पारिवारिक प्रसंगों के ही होंगे. किसी सामान्य व्यक्ति के लिए यही प्राकृतिक तारतम्य है. सामान्य व्यक्ति अपने जीवन की नियति नहीं जानता; वह बस अपने जीवन की कौंध में व्यस्त है, परिवार का पालन कर रहा है. अंतिम स्थिति पर, कोई भी इस बात से संतुष्ट नहीं होता कि उसने पारिवारिक आर्थिक स्थिति को कैसे सुधारा है; सभी यह विचार करते हैं कि वह पर्याप्त नहीं दे सका. अपने गहरे पारिवारिक स्नेह के कारण, वह इंद्रियों का नियंत्रण करने और अपनी आध्यात्मिक चेतना को बेहतर करने का अपना मुख्य कर्तव्य भूल जाता है. कभी-कभी मरता हुआ एक व्यक्ति अपने बेटे या किसी संबंधी को परिवार के प्रसंग यह कहते हुए सौंप देता है, कि “मैं जा रहा हूँ. कृपया परिवार का ध्यान रखना.” वह नहीं जानता कि वह कहाँ जा रहा है, बल्कि मृत्यु के समय भी उसे अपने परिवार के पालन की चिंता होती है. कभी-कभी यह देखा जाता है कि एक मरणासन्न व्यक्ति चिकित्सक से अपने जीवन को कम से कम कुछ वर्षों के लिए बढ़ाने का अनुरोध करता है ताकि परिवार के पालन की जिस योजना को उसने शुरू किया है वह पूरी की जा सके. ये बद्ध आत्मा के भौतिक रोग होते हैं. वह अपनी वास्तविक वचनबद्धता–कृष्ण चैतन्य बनना– को पूरी तरह से भूल जाता है, और अपने परिवार के पालन की योजना के बारे में सदैव गंभीर रहता है, यद्यपि वह एक के बाद एक परिवार बदलता है.

अभय चरणारविंद स्वामी प्रभुपाद (2014 संस्करण, अंग्रेजी), “श्रीमद् भागवतम्”, तृतीय सर्ग, अध्याय 30- पाठ 18

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