चूँकि चित्रकेतु भगवान का भक्त था, इसलिए माता पार्वती के श्राप से वह ज़रा भी विचलित नहीं हुआ. (यात्रा के दौरान एक दिन, चित्रकेतु सुमेरु पर्वत के लतामंडपों में भटक गया, जहाँ उसने सिद्धों, चारणों और महान संतों की सभा में घिरे भगवान शिव को पार्वती का आलिंगन करते देख लिया. भगवान शिव को उस स्थिति में देखकर, चित्रकेतु बहुत ज़ोर से हँसने लगा, लेकिन पार्वती उस पर बहुत क्रोधित हो गयीं और उसे श्राप दे दिया. इस श्राप के कारण, चित्रकेतु बाद में राक्षस व्रतासुर के रूप में प्रकट हुआ). उसे भली प्रकार से पता था कि व्यक्ति को उसके पिछले कर्मों के फल भुगतने पड़ते हैं जैसा कि दैव-नेत्र– उच्चतर अधिकारी, या भगवान के परम व्यक्तित्व के प्रतिनिधियों द्वारा तय किया जाता है. वह जानता था कि उसने भगवान शिव या देवी पार्वती के चरण कमलों में कोई अपराध नहीं किया था, फिर भी उसे दंडित किया गया था, और इसका अर्थ है कि दंड को नियत किया गया था. अतः राजा ने बुरा न माना. एक भक्त स्वाभाविक रूप से इतना विनम्र और मृदुल होता है कि वह जीवन की किसी भी स्थिति को भगवान के आशीर्वाद के रूप में स्वीकार करता है. तत् ते ’नुकंपम् सुसमीक्षमनाः (भाग। 10.14.8). एक भक्त किसी के द्वारा भी दंड को भगवान के आशीर्वाद के रूप में स्वीकार करता है. यदि कोई जीवन की ऐसी धारणा रखता है, तो वह होने वाली विपरीत घटनाओं का कारण भी अपने पिछले कुकर्मों को मानता है, और इसलिए वह किसी अन्य को दोष नहीं देता. इसके विपरीत, वह अपने दुख से शुद्ध होने के कारण भगवान के परम व्यक्तित्व से और अधिक जुड़ जाता है. इसलिए दुख शुद्धिकरण की एक प्रक्रिया भी है.

अभय चरणारविंद स्वामी प्रभुपाद (2014 संस्करण, अंग्रेजी), श्रीमद् भागवतम्, छठा सर्ग, अध्याय 17- पाठ 17

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