भक्ति में इस भौतिक संसार के बंधनों से मुक्त होना और उसके स्थान पर कृष्ण से जुड़ना शामिल होता है. व्यक्ति बंधनरहित नहीं हो सकता, क्योंकि व्यक्ति किसी न किसी वस्तु से जुड़ा होता है, लेकिन कृष्ण से जुड़ने या भगवान की आध्यात्मिक सेवा में प्रवेश करने के क्रम में, व्यक्ति को भौतिक स्नेह से अलग होना पड़़ता है.

साधना-भक्ति, या आध्यात्मिक सेवा के अभ्यास को दो भागों में बांटा जा सकता है. पहले भाग को नियामक सिद्धांत कहा जाता है: आध्यात्मिक गुरु के आदेश से, या आधिकारिक शास्त्रों के बल से व्यक्ति को इन विभिन्न नियामक सिद्धांतों का पालन करना पड़ता है, और अस्वीकार करने का कोई प्रश्न नहीं उठता है. उसे वैधि, या नियमित कहते हैं. व्यक्ति को ऐसा बिना तर्क किए करना होता है. साधना-भक्ति का एक और भाग रागानुराग कहलाता है. रागानुराग का अर्थ ऐसे बिंदु से है, जहाँ व्यक्ति नियामक सिद्धांतों का पालन करके, कृष्ण से और अधिक जुड़ जाता है और स्वाभाविक प्रेम से आध्यात्मिक सेवा निभाता है. उदाहरण के लिए, आध्यात्मिक सेवा में रत किसी व्यक्ति को प्रातः जल्दी जागने और आरती करने का आदेश दिया जा सकता है, जो देवता पूजा का एक रूप है. प्रारंभ में, व्यक्ति अपने आध्यात्मिक गुरु के आदेश से प्रातः जल्दी जागता है और आरती करता है, लेकिन फिर वह वास्तविक लगाव विकसित कर लेता है. जब उसे लगाव हो जाता है, तो वह स्वतः ही देवता का श्रंगार करने और विभिन्न पोशाकें बनाने का प्रयास करता है और अपनी आध्यात्मिक सेवा को अच्छे से निष्पादित करने की योजनाओं पर विचार करता है. यद्यपि यह अभ्यास की श्रेणी में आता है, लेकिन प्रेममयी सेवा की यह प्रस्तुति स्वाभाविक होती है. अतः आध्यात्मिक सेवा के अभ्यास, साधना-भक्ति को नियामक और स्वाभाविक, दो भागों में विभाजित किया जा सकता है.

अभय चरणारविंद स्वामी प्रभुपाद (2012 संस्करण, अंग्रेजी), “भगवान चैतन्य, स्वर्ण अवतार की शिक्षाएँ”, पृ. 178
अभय चरणारविंद स्वामी प्रभुपाद (2011 संस्करण, अंग्रेजी), “भक्ति का अमृत”, पृ. 21

(Visited 62 times, 1 visits today)
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •