अन्याभिलाषित-शून्यम ज्ञानः-कर्मादि-अनाव्रतम
अनुकूलयेन कृष्णानुशीलनम भक्तिर् उत्तमा
(भक्ति-रसामृत-सिंधु 1.1.11)

“व्यक्ति को अनुकूलता पूर्वक और फलकारी गतिविधियों या दार्शनिक अटकलों के माध्यम से भौतिक लाभ की इच्छा के बिना परम भगवान कृष्ण के प्रति पारलौकिक प्रेममयी सेवा निष्पादित करनी चाहिए. यह शुद्ध भक्ति सेवा कहलाती है.” विशुद्ध श्रद्धालु भगवान के परम व्यक्तित्व से कुछ भी नहीं माँगते. कभी-कभी, जब कोई विकल्प नहीं होता, तो एक शुद्ध भक्त, परम भगवान की दया पर निर्भर रहते हुए, किंचित आशीर्वाद के लिए प्रार्थना करता है. किंतु ऐसी प्रार्थना में पछतावा भी होता है. जो व्यक्ति हमेशा भगवान की पारलौकिक लीलाओं का श्रवण और जाप करता है, वह हमेशा ऐसे स्तर पर स्थित होता है जहाँ उसे भौतिक लाभों के लिए कुछ भी माँगने की आवश्यकता नहीं होती.

स्रोत – अभय चरणारविंद स्वामी प्रभुपाद (2014 संस्करण, अंग्रेज़ी), “श्रीमद् भागवतम्” , आठवाँ सर्ग, अध्याय 3 – पाठ 20 व 21

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