कर्दम मुनि घर से जाते समय अपनी पत्नी, देवाहुति के लिए चिंतित थे, और इसलिए योग्य पुत्र ने वचन दिया कि न केवल कर्दम मुनि भौतिक बंधनों से मुक्त होंगे, बल्कि देवाहुति भी अपने पुत्र के निर्देश प्राप्त करके मुक्त होंगी. यहाँ एक बहुत अच्छा उदारण प्रस्तुत किया गया है: आत्म-साक्षात्कार के लिए सन्यास आश्रम अपनाकर, पति चला जाता है, लेकिन उसका प्रतिनिधि, पुत्र, जो कि समान रूप से शिक्षित है, माँ की सेवा के लिए घर पर रह जाता है. एक सन्यासी को अपनी पत्नी को अपने साथ नहीं ले जाना चाहिए. निवृत्त जीवन की वानप्रस्थ अवस्था या गृहस्थ जीवन और त्याग के जीवन के मध्यमार्ग की अवस्था में, व्यक्ति अपनी पत्नी को बिना यौन संबंध के एक सहयोगी के रूप में रख सकता है, लेकिन सन्यास जीवन की व्यवस्था में व्यक्ति अपनी पत्नी को साथ नहीं रख सकता. अन्यथा, कर्दम मुनि जैसा व्यक्ति अपनी पत्नी को साथ रख सकता था, और आत्म-साक्षात्कार के उनके अभियोजन के लिए कोई बाधा नहीं होती. कर्दम मुनि ने वैदिक निषेधाज्ञा का पालन किया कि संन्यास जीवन में कोई भी स्त्रियों के साथ किसी भी प्रकार का कोई संबंध नहीं रख सकता है. लेकिन उस स्त्री की स्थिति क्या है जिसे उसका पति छोड़ गया हो? उसे अपने पुत्र को सौंपा गया है, और पुत्र वचन देता है कि वह अपनी माता को बंधनों से मुक्ति दिलाएगा. एक स्त्री को सन्यास नहीं लेना चाहिए. आधुनिक काल में मनगढ़ंत आध्यात्मिक समाज महिलाओं को भी सन्यास दे देते हैं, यद्यपि वैदिक साहित्य में किसी स्त्री के लिए सन्यास स्वीकार करने की अनुमति नहीं है. अन्यथा, यदि अनुमति होती, तो कर्दम मुनि अपनी पत्नी को ले जाते और उन्हें सन्यास दे देते. स्त्री को घर पर ही रहना चाहिए. उसके जीवन की केवल तीन अवस्थाएँ होती हैं: बचपन में पिता पर निर्भरता, युवावस्था में पति पर निर्भरता, वृद्धावस्था में, बड़े हो चुके पुत्र पर निर्भरता, जैसे कपिल. वृद्धावस्था में स्त्री की प्रगति बड़े हो चुके पुत्र पर निर्भर होती है. आदर्श पुत्र, कपिल मुनि, अपने पिता को अपनी माँ की मुक्ति का भरोसा दिला रहे हैं ताकि पिता अपनी अच्छी पत्नी के लिए किसी भी चिंता के बिना शांतिपूर्वक जा सकें.

<span style=”color: #00CCFF;”>अभय चरणारविंद स्वामी प्रभुपाद (2014 संस्करण, अंग्रेजी), “श्रीमद् भागवतम्”, तृतीय सर्ग, अध्याय 24- पाठ 40</span>

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