“आत्म-निर्भर होते हुए भगवान का परम व्यक्तित्व पारलौकिक आनंद (आत्माराम) से भरा होता है. वह दो प्रकार से आनंद भोग करते है–जब वह सुखी दिखाई देते है और जब वह दुखी दिखाई देते है. उनके भीतर विभेद और विरोधाभासों का होना असंभव है क्योंकि केवल उनसे ही वे उत्पन्न होते हैं. भगवान का परम व्यक्तित्व सभी ज्ञान, सभी शक्ति, सभी शक्ति, संपन्नता और प्रभाव का भंडार होता है. उनकी शक्तियों की कोई सीमा नहीं है. चूँकि वह सभी पारलौकिक विशेषताओं से परिपूर्ण है, भौतिक दुनिया की कोई भी घृणित वस्तु उनमें उपस्थित नहीं हो सकती. वह पारलौकिक और आध्यात्मिक है, और इसलिए भौतिक सुख और संकट की अवधारणाएँ उन पर लागू नहीं होती हैं. भगवान के परम व्यक्तित्व में विरोधाभास पाकर हमें आश्चर्यचकित नहीं होना चाहिए. वास्तव में कोई विरोधाभास नहीं हैं. उनके परम होने का अर्थ यही है. चूँकि वह सर्व-शक्तिमान है, इसलिए उनके अस्तित्व या अनस्तित्व के संबंध में वह बद्ध आत्मा के तर्कों के अधीन नहीं है. वह अपने भक्तों के शत्रुओं को मारकर उनकी रक्षा करने में प्रसन्न है. वह वध और सुरक्षा दोनों करने का आनंद लेते है. द्वैत से ऐसी मुक्ति केवल भगवान के लिए ही नहीं बल्कि उनके भक्तों के लिए भी लागू होती है. वृंदावन में वृजभूमि की सुंदरियाँ परम भगवान के व्यक्तित्व, कृष्ण की संगति में पारलौकिक आनंद भोगती हैं, और वे समान पारलौकिक आनंद का अनुभव विछोह में भी करती हैं जब कृष्ण और बलराम वृंदावन से मथुरा चले जाते हैं. यहाँ भगवान के परम व्यक्तित्व या उनके शुद्ध भक्तों के लिए भौतिक दुख या आनंद का कोई प्रश्न नहीं है, यद्यपि सतही रूप से उन्हें कभी-कभी दुखी या सुखी बताया जाता है. जो आत्माराम होता है वह दोनों प्रकार से आनंदमय होता है.

अभक्त लोग परम भगवान या उनके भक्तों में उपस्थित विरोधाभास को नहीं समझ सकते. इसलिए भगवद-गीता में भगवान कहते हैं, भक्त्य मम अभिज्ञानाति : पारलौकिक लीलाओं को भक्ति सेवा के माध्यम से समझा जा सकता है; अभक्तों के लिए वे कल्पनातीत होती हैं. अचिंत्य खलु ये भाव न तंस तर्केण योजयेत : परम भगवान और उनका स्वरूप, नाम, लीलाएँ और साज-सज्जा अभक्तों की कल्पना से बाहर होती हैं, और व्यक्ति को ऐसी वास्तविकताओं को केवल तार्किक अवधारणाओं से समझने का प्रयास नहीं करना चाहिए. वे व्यक्ति को परम सत्य के बारे में सच्चे निष्कर्ष पर नहीं पहुँचा सकेंगी.”

अभय चरणारविंद स्वामी प्रभुपाद (2014 संस्करण, अंग्रेजी), श्रीमद् भागवतम्, छठा सर्ग, अध्याय 9- पाठ 36

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