जैसा कि भगवद्-गीता (7.20) में कहा गया है, कामैष तैस हृत ज्ञानाः प्रपद्यंते’ न्य-देवताः. “वे जिनके चित्त भौतिक कामनाओं से विकृत हो जाते हैं, देवताओं की शरण लेते हैं.” देवता स्वामी नहीं बन सकता, क्योंकि वास्तविक स्वामी भगवान के परम व्यक्तित्व ही हैं. अपने प्रतिष्ठित पद को बनाए रखने के लिए, देवता अपने उपासकों को मनचाहे वर दे देते हैं जो भी उपासक चाहता है. उदाहरण के लिए, एक बार पता लगा कि असुर को भगवान शिव से ऐसा वर मिला है जिसके द्वारा असुर किसी के भी सिर पर हाथ रखकर उसे मार सकेगा. देवताओं से एसे वरदान पाना संभव है. यदि व्यक्ति भगवान के परम व्यक्तित्व की उपासना करता है, तो, यद्यपि भगवान कभी भी उसे ऐसे निंदित वरदान नहीं देंगे. इसके विपरीत, श्रीमद्-भागवतम् (10.88.8) में कहा गया है, यस्यहम् अनुग्रहणामि हरिष्ये तद्-धनम शनैः. यदि व्यक्ति बहुत भौतिकवादी है किंतु साथ ही परम भगवान का सेवक बनना चाहता है, तो भक्त के लिए उनकी परम करुणा के कारण, भगवान, उसकी समस्त भौतिक संपन्नता हर लेते हैं और उसे भगवान का शुद्ध भक्त बनने की कृपा करते हैं. प्रह्लाद महाराज शुद्ध भक्त और शुद्ध स्वामी का अंतर पहचानते हैं. भगवान शुद्ध स्वामी हैं, परम स्वामी हैं, जबकि किसी भी भौतिक उद्देश्य से विहीन एक पवित्र भक्त ही शुद्ध भक्त होता है. वह जिसकी भौतिक प्रेरणा हो वह सेवक नहीं बन सकता, और वह जो अपना प्रतिष्ठित पद बनाए रखने के लिए अनावश्यक रूप से अपने सेवक को वरदान प्रदान करता है सच्चा स्वामी नहीं होता.

 

स्रोत- अभय चरणारविंद भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद (2014 संस्करण, अंग्रेजी), “श्रीमद् भागवतम्”, सातवाँ सर्ग, खंड 10- पाठ 05

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