भगवान बुद्ध ने कहा है कि हम सभी भौतिक कामनाओं को छोड़ देते हैं. कामना रहित होना संभव नहीं है, लेकिन भौतिक कामनाओं को छोड़ना संभव है. कामना करना जीव का स्वभाव है; कामना रहित होना संभव नहीं है. यदि कोई कामना रहित है तो वह मर चुका है. कामना रहित होने का अर्थ है व्यक्ति की कामना का शुद्धीकरण करना, और कामना तब शुद्ध हो जाती है जब हम केवल कृष्ण की सेवा की कामना करते हैं. भक्त परम के अस्तित्व में विलय के लिए उत्सुक नहीं होते हैं. बौद्ध दर्शन निर्वाण, सभी भौतिक कामनाओं को नकारने का पक्ष लेता है. बुद्ध इससे अधिक कुछ नहीं प्रस्तुत करते. शंकराचार्य थोड़ा और देते हैं, यह कहते हुए कि हमें इस भौतिक संसार में कामना रहित हो जाना चाहिए और फिर ब्राम्हण दीप्ति में प्रवेश करना चाहिए. यह ब्रम्ह-निर्वाण कहलाता है. वैष्णव दर्शन के अनुसार, यद्यपि, हमें भौतिक कामनाओं को नकारना चाहिए और ब्राम्हण स्तर में स्थित होना चाहिए, लेकिन इसके अतिरिक्त हमें भगवान की भक्ति सेवा में रत होना चाहिए. इसे भक्ति कहते हैं. मायावादी दार्शनिक इसे नहीं समझ सकते, लेकिन कृष्ण कहते हैं कि यह भक्ति सेवा पारलौकिक स्तर पर होती है. विधान द्वारा, एक जीव में किसी वस्तु से जुड़ने की प्रवृत्ति होती है. हम देखते हैं कि अगर किसी के पास लगाव की कोई वस्तु नहीं है, यदि उसके कोई संतान नहीं है, तो वह बिल्लियों और कुत्तों के प्रति अपने लगाव को स्थानांतरित करता है. यह इंगित करता है कि लगाव की प्रवृत्ति को रोका नहीं जा सकता है; बल्कि, इसका उपयोग सर्वोत्तम उद्देश्य के लिए किया जाना चाहिए. भौतिक वस्तुओं के लिए हमारा लगाव हमारी बद्ध स्थिति को बनाए रखता है, लेकिन वही लगाव, जब भगवान के परम व्यक्तित्व या उनके भक्त को हस्तांतरित किया जाता है, तो मुक्ति का स्रोत होता है. हमारी कई इच्छाएँ हैं, लेकिन हमें इन इच्छाओं को कृष्ण की सेवा में बदलना होगा. उदाहरण के लिए, हम धन कमाने के लिए बहुत आसक्त हो सकते हैं; इसलिए कृष्ण कहते हैं, “हाँ, आगे बढ़ो और अपने व्यवसाय का संचालन करो. कोई हानि नहीं है. बस मुझे परिणाम दो.” जैसा कि भगवद-गीता (9.27) में कहा गया है. यत् करोषि यद् अस्नानि यज जुहोसषि ददसि यत यत् तपस्याकि कौंतेय तत् कुरुष्व मद्-अर्पणम् “हे कुंती पुत्र, जो कुछ भी तुम करते हो, जो कुछ भी तुम खाते हो, जो कुछ भी तुम अर्पित करते हो और त्यागते हो, साथ ही सभी तप जो तुम निष्पादित करते हो, उसे मेरे प्रति अर्पण किया जाना चाहिए.” यह भक्ति-योग की शुरुआत है. यदि हम व्यवसाय करते हैं और धन कमाते हैं, तो हमें इसे कृष्ण के लिए व्यय करना चाहिए. यह भक्ति का एक रूप है. एक और ज्वलंत उदाहरण अर्जुन है, जो एक सेनानी था. युद्ध करके वह भक्त बन गया. वह हरे कृष्ण का जाप करके नहीं बल्कि कुरुक्षेत्र के युद्ध में लड़कर भक्त बना. कृष्ण ने उसे युद्ध करने की सुझाव दिया, लेकिन क्योंकि अर्जुन एक वैष्णव था, शुरुआत में वह अनिच्छुक था. एक वैष्णव किसी की भी हत्या करना पसंद नहीं करता है, लेकिन अगर कृष्ण उसे आदेश देते हैं, तो उसे लड़ना चाहिए. वह अपनी इच्छा से नहीं लड़ता है, क्योंकि एक वैष्णव की स्वाभाविक प्रवृत्ति किसी को हानि पहुँचाने की नहीं होती. यद्यपि जब किसी वैष्णव को ज्ञात होता है कि कृष्ण कोई विशेष कार्य कराना चाहते हैं, तो वह अपने विचारों की चिंता नहीं करता.

स्रोत: अभय चरणारविंद भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद (2007, अंग्रेजी संस्करण). “देवाहुति पुत्र, भगवान कपिल की शिक्षाएँ”, पृ. 129, 151, व 197 अभय चरणारविंद भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद (2014, अंग्रेजी संस्करण), “आत्मज्ञान के लिए खोज” पृ. 91

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