एक प्रामाणिक वैदिक ग्र्ंथ है जिसे पिंड-सिद्धि कहा जाता है जिसमें गर्भावस्था की वैज्ञानिक समझ बहुत अच्छी तरह से वर्णित की गई है. कहा गया है कि जब पुरुष वीर्य दो अनुक्रमिक बूंदों में गर्भाशय के भीतर मासिक धर्म के प्रवाह में गर्भाशय में प्रवेश करता है, तो माँ अपनी कोख में दो भ्रूण विकसित करती है, और वह जुड़वाँ बच्चों को उल्टी अवस्था में जन्म देती है जैसे कि वे गर्भ में पहली बार आए थे; गर्भ में पहले धारित बच्चा बाद में जन्म लेता है, और बाद में गर्भ में आने वाला बच्चा पहले जन्मता है. गर्भ में पल रहा पहला बच्चा दूसरे बच्चे के पीछे रहता है, इसलिए जब जन्म होता है तो दूसरा बच्चा पहले प्रकट होता है, और पहला बच्चा दूसरे क्रम पर जन्म लेता है. इस प्रसंग में यह समझ आता है कि गर्भधारित दूसरा बच्चे का जन्म पहले हुआ था, जबकि हिरण्यकशिपु, वह बच्चा जो उसके पीछे था, जो गर्भ में पहले आया था, उसका जन्म दूसरे क्रम पर हुआ.

स्रोत: अभय चरणारविंद भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद (2014, अंग्रेजी संस्करण), “श्रीमद्-भागवतम” तीसरा सर्ग, अध्याय 17 – पाठ 18

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