मूर्ख लोग नहीं जानते कि प्रत्येक आत्मा जीवन में अपने कार्यों और प्रतिक्रियाओं के लिए उत्तरदायी होती है. जब तक एक जीव किसी शिशु या बालक के रूप में है, वह निर्दोष होता है, पिता और माता का यह कर्तव्य है कि वे उसे जीवन मूल्यों की उचित समझ की ओर अग्रसर करें. जब एक बालक बड़ा हो जाता है, तो उसे जीवन के कर्तव्यों को ठीक से निष्पादित करने के लिए छोड़ दिया जाना चाहिए. माता-पिता, मृत्यु के बाद, अपनी संतान की सहायता नहीं कर सकते. एक पिता अपने बच्चों की तत्काल सहायता के लिए कुछ संपत्ति छोड़ सकता है, लेकिन उसे इस विचार में अधिक नहीं पड़ना चाहिए कि उसकी मृत्यु के बाद उसका परिवार कैसे बचेगा. यह बद्ध आत्मा का रोग है. वह न केवल स्वयं के इंद्रिय सुख के लिए पापमय गतिविधियाँ करता है, बल्कि वह अपने पीछे छोड़ जाने के लिए बहुत संपत्ति का संचय करता है ताकि उसकी संतानें भी इंद्रिय संतुष्टि का प्रबंध कर सकें. कुछ भी हो, हर कोई मृत्यु से डरता है, और इसलिए मृत्यु को भय, या डर कहा जाता है. यद्यपि राजा पुरंजन अपनी पत्नी और संतानों के बारे में विचारमग्न थे, मृत्यु ने उनकी प्रतीक्षा नहीं की. मृत्यु किसी मनुष्य की प्रतीक्षा नहीं करती; वह तुरंत अपना कर्तव्य निभाएगी. चूँकि मृत्यु जीव को बिना किसी संकोच के ले जाती है, यह नास्तिकों के लिए भगवान का परम बोध होती है, जो भगवान चेतना की अवहेलना करते हुए देश, समाज और संबंधियों की चिंता में अपना जीवन नष्ट कर लेते हैं. इस श्लोक में आतद्-अर्हनम शब्द बहुत महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसका अर्थ है कि व्यक्ति को अपने परिवार के सदस्यों, देशवासियों, समाज और समुदाय के लिए कल्याणकारी कार्यों में अति-संलग्न नहीं होना चाहिए. इनमें से कोई भी आध्यात्मिक रूप से प्रगति करने में सहायता नहीं करेगा. दुर्भाग्य से, वर्तमान समाज में तथाकथित शिक्षित मनुष्यों को पता नहीं है कि आध्यात्मिक प्रगति क्या है. यद्यपि जीवन के मानव रूप में उनके पास आध्यात्मिक प्रगति करने के लिए अवसर है, फिर भी वे अभागे रह जाते हैं. वे अपने जीवन का उपयोग अनुचित ढंग से करते हैं और उन्हें केवल अपने रिश्तेदारों, देशवासियों, समाज आदि के भौतिक कल्याण के चिंतन में नष्ट कर देते हैं. व्यक्ति का वास्तविक कर्तव्य यह सीखना है कि मृत्यु पर विजय कैसे पाते हैं. भगवान कृष्ण भगवद गीता (4.9) में मृत्यु पर विजय पाने की प्रक्रिया बताते हैं: जन्म कर्म च मे दिव्यम् एवं यो वेत्ति तत्वतः त्यक्त्व देहम् पुनर्जन्म नेति मम इति सो अर्जुन “जो मेरे स्वरूप और क्रियाकलापों के पारलौकिक स्वरूप को जानता है, वह शरीर छोड़ने पर, इस भौतिक संसार में फिर से जन्म नहीं लेता है, बल्कि मेरे शाश्वत निवास को प्राप्त करता है, हे अर्जुन.” इस शरीर को त्यागने के बाद, जो पूर्ण रूप से कृष्ण चेतन है, वह किसी अन्य भौतिक शरीर को स्वीकार नहीं करता है, बल्कि वापस घर, परम भगावन के पास लौट आता है. सभी को इस पूर्णता को प्राप्त करने का प्रयास करना चाहिए. दुर्भाग्य से, ऐसा करने के बजाय, लोग समाज, मित्रता, प्रेम और रिश्तेदारों के विचारों में लीन रहते हैं. हालाँकि, यह कृष्ण चेतना आंदोलन संसार भर में लोगों को शिक्षित कर रहा है और उन्हें बता रहा है कि मृत्यु पर कैसे विजय प्राप्त की जाए. हरिं विना न श्रतिम् तरंति. व्यक्ति भगवान के परम व्यक्तित्व की शरण में जाए बिना मृत्यु पर विजय नहीं प्राप्त कर सकता.

स्रोत: अभय चरणारविंद भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद (2014, अंग्रेजी संस्करण), “श्रीमद्-भागवतम” चतुर्थ सर्ग, अध्याय 28 – पाठ 22

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