माया अत्यंत शक्तिशाली है. परोपकार, परहितवाद और साम्यवाद के नाम पर, संसार भर में लोग पीड़ित मानवता के लिए करुणा का अनुभव कर रहे हैं. परोपकारी और परहितवादी लोग यह अनुभव नहीं करते हैं कि लोगों की भौतिक स्थिति में सुधार करना असंभव है. भौतिक स्थिति पहले से ही उच्चतर प्रशासन द्वारा व्यक्ति के कर्म के अनुसार स्थापित की जाती है. उन्हें बदला नहीं जा सकता. पीड़ित प्राणियों को हम केवल एक ही लाभ दे सकते हैं, उन्हें आध्यात्मिक चेतना में उन्नत करने का प्रयास कर सकते हैं. भौतिक सुख-सुविधाओं को बढ़ाया या घटाया नहीं जा सकता. इसलिए श्रीमद-भागवतम (1.5.18) में कहा गया है, ताल लभ्यते दुखवाद अन्यतः सुखम्: “जहाँ तक भौतिक सुख का प्रश्न है, वह बिना परिश्रम के आता है, जैसे क्लेश बिना परिश्रम के आता है.” भौतिक सुख और कष्ट बिना प्रयास के प्राप्त किया जा सकता है. भौतिक गतिविधियों के लिए व्यक्ति को चिंता नहीं करना चाहिए. यदि कोई अन्य के प्रति थोड़ी भी सहानुभूति रखता है या भला करने में सक्षम है, तो उसे लोगों को कृष्ण चेतना में उन्नत करने का प्रयास करना चाहिए. इस प्रकार हर कोई भगवान की कृपा से आध्यात्मिक रूप से प्रगति करता है. हमें निर्देशित करने के लिए, भरत महाराजा ने ऐसा व्यवहार किया. हमें बहुत सावधान रहना चाहिए और शारीरिक, संदर्भ में तथाकथित कल्याणकारी गतिविधियों द्वारा पथभ्रष्ट नहीं होना चाहिए. किसी भी मूल्य पर भगवान विष्णु की कृपा पाने में अपनी रुचि नहीं छोड़नी चाहिए. सामान्यतः लोग यह नहीं जानते, या वे इसे भूल जाते हैं. फलस्वरूप वे अपने मूल हित, विष्णु की कृपा प्राप्ति का त्याग कर देते हैं, और शारीरिक सुख के लिए परोपकारी कार्यों में संलग्न हो जाते हैं.

स्रोत: अभय चरणारविंद भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद (2014, अंग्रेजी संस्करण), “श्रीमद्-भागवतम” पांचवाँ सर्ग, अध्याय 8 – पाठ 10

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