प्रसन्न व्यक्ति सोच रहे हैं, “मैं बहुत अच्छे प्रकार से इस भौतिक संसार का भोग कर सकता हूँ. सभी लोग अच्छा समय व्यतीत कर रहे हैं. ऐसा कोई कारण नहीं है कि मैं उनके समान ही आनंद न ले सकूँ.” यह विचार भ्रम है क्योंकि भौतिक संसार में कोई वास्तविक सुख नहीं होता. हम किसी बहुत ऊँचे पद पर पहुँच सकते हैं जैसे राष्ट्रपति केनेडी. हम बहुत सुंदर हो सकते हैं, बहुत प्रसिद्ध, बहुत बुद्धिमान, और सुशिक्षित, बहुत संपन्न और बहुत शक्तिशाली हो सकते हैं, और हमारी बहुत सुंदर पत्नी और बच्चे हो सकते हैं और देश के सबसे ऊँचे पद पर हो सकते हैं-लेकिन किसी भी समय हमें गोली मारी जा सकती है. इस भौतिक संसार का यही स्वभाव है: हमें प्रत्येक चरण पर खतरे का सामना करना पड़ेगा. बिना बाधा के सुख होने का प्रश्न ही नहीं है. सुख प्राप्त होने पर भी, उन्हें बहुत संघर्ष और बलिदान के बाद अर्जित किया जाता है, और जो भी सुख प्राप्त किया जा सकता है वह अस्थायी है, क्योंकि भौतिक संसार में ऐसा कोई सुख नहीं है जो हमें स्थायी और न समाप्त होने वाला आनंद दे सके. केवल कृष्ण ही हमें वह दे सकते हैं. कृष्ण पुरुषोत्तम हैं. पुरुष शब्द का अर्थ है “आनंद लेने वाला”. बद्ध जीव झूठे भोगी, नकली भोगी होते हैं. यहाँ इस भौतिक संसार में, सभी जीव पुरुष के रूप में व्यवहार कर रहे हैं. पुरुष की अधिक सटीक अर्थ “नर” है. पुरुष को आनंद माना जाता है, और नारी को भोग्य माना जाता है. भौतिक संसार में, चाहे कोई नर हो या नारी शरीर, सभी में आनंद लेने की प्रवृत्ति होती है, और इसलिए सभी को पुरुष कहा जाता है. परंतु वास्तव में एकमात्र पुरुष परम भगवान ही हैं. हम जीव उनकी ऊर्जा हैं, और वे सर्वोच्च आनंद लेने वाले हैं. हम पुरुष नहीं हैं. आनंद के लिए ऊर्जा कार्यरत हैं, और हम ऊर्जा, परम व्यक्तित्व के साधन हैं. इसलिए पुरुषोत्तम सर्वोच्च पारलौकिक व्यक्ति कृष्ण ही हैं. जब भगवान के परम व्यक्तित्व के लिए हमारी शुद्ध भक्ति कार्यरत हो और कोई बाधाएँ न हों, तो वह शुद्ध कृष्ण चेतना का लक्षण होता है.

स्रोत: अभय चरणारविंद भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद (2014, अंग्रेजी संस्करण), “आत्म साक्षात्कार का विज्ञान” पृ. 338 व 350

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