“बंगाली भाषा के एक गीत है जिसमें कहा गया है, “मैंने सुख के लिए इस घर को बनाया, किंतु दुर्भाग्य से आग लग गई, और सबकुछ जल कर भस्म हो गया.” यह भौतिक सुख के स्वभाव को दिखाता है. सब जानते हैं, किंतु फिर भी व्यक्ति कुछ बहुत सुखकारी सुनने या उसका विचार करने की योजना बनाता है. दुर्भाग्य से, व्यक्ति की सभी योजनाएँ समय के साथ विनष्ट हो जाती हैं. ऐसे कई राजनेता थे जिन्होंने साम्राज्यों, प्रभुत्व और संसार के नियंत्रण की योजना बनाई, किंतु समय के साथ उनकी सारी योजनाएँ और साम्राज्य–और स्वयं राजनेता भी–विनष्ट हो गए. सभी को प्रह्लाद महाराज से इस बारे में शिक्षा लेनी चाहिए कि हम किस प्रकार इंद्रिय तुष्टि के लिए शारीरिक कर्मों द्वारा तथाकथित अस्थायी सुख में लगे हैं. हम सभी बार-बार योजनाएँ बनाते हैं, जिन पर लगातार निराशा ही होती है. इसलिए व्यक्ति को ऐसी योजना बनाना बंद करना चाहिए.

जैसे व्यक्ति लगातार घी उड़ेल कर प्रज्ज्वलित अग्नि को नहीं रोक सकता, उसी प्रकार व्यक्ति इंद्रिय भोग के लिए उत्तरोत्तर योजनाओं द्वारा स्वयं को संतुष्ट नहीं कर सकता. प्रज्ज्वलित अग्नि भव-महा-दावाग्नि है, भौतिक अस्तित्व का दावानल. यह जंगली अग्नि बिना प्रयास के स्वतः पैदा होती है. हम भौतिक संसार में सुखी होना चाहते हैं, किंतु ऐसा कभी भी संभव नहीं होगा; हम बस कामनाओं के दावानल को बढ़ाएँगे. हमारी कामनाएँ मायावी विचारों और योजनाओं से तुष्ट नहीं की जा सकतीं; इसके विपरीत, हमें भगवान कृष्ण के निर्देशों का पालन करना होगा : सर्व-धर्मन् परित्याज्य मम एकम् शरणम् व्रज. तब हम सुखी होंगे. अन्यथा, सुख के नाम पर, हम नारकीय स्थितियों को भोगते रहेंगे. ”

 

स्रोत- अभय चरणारविंद भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद (2014 संस्करण, अंग्रेजी), “श्रीमद् भागवतम्”, सातवाँ सर्ग, खंड 09- पाठ 25

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