“जैसे ही जीव भौतिक प्रकृति पर श्रेष्ठता सिद्ध करने के लिए भौतिक कामनाओं के चंगुल में फँसता है, वह भौतिक प्रकृति के नियंत्रण के अधीन हो जाता है, जिसका व्यवस्थापन परम आत्मा द्वारा किया जाता है. परिणाम यह कि व्यक्ति बारंबार योजना बनाता है और छला जाता है, किंतु मूर्खतावश वह अपनी उलझन के कारण को नहीं देख सकता. इस कारण को भगवद्-गीता में स्पष्ट रूप से व्यक्ति किया गया है : चूँकि व्यक्ति ने भगवान के परम व्यक्तित्व के प्रति समर्पण नहीं किया है, उसे भौतिक प्रकृति और उसके कड़े नियमों के अधीन व्यवहार करना होगा (दैविहि ऐषा गुणमयी मम माया दुरत्याय). इस बंधन से मुक्त होने का एकमात्र साधन परम भगवान के प्रति समर्पण करना ही है. जीवन के मानव रूप में, जीव को परम व्यक्ति, कृष्ण का यह निर्देश स्वीकार करना चाहिए : सर्व-धर्मम परित्याज्य मम एकम् शरणम् व्रज. “सुख प्राप्त करने और दुख को दूर भगाने की योजना मत बनाओ. आप कभी सफल नहीं होंगे. बस मेरी शरण में आ जाओ.”

दुर्भाग्य से, यद्यपि, जीव भगवद्-गीता में कहे गए भगवान के निर्देश को स्वीकार नहीं करता, और इस प्रकार वह भौतिक प्रकृति के नियमों का शाश्वत बंदी बन जाता है. यज्ञार्थात् कर्मणो न्यत्र लोको यम कर्म-बंधनः – यदि व्यक्ति कृष्ण की संतुष्टि के लिए कर्म नहीं करता, जिन्हें विष्णु या यज्ञ के रूप में जाना जाता है, तो उसे परिणामी गतिविधियों की प्रतिक्रियाओं में उलझना ही होगा. ये प्रतिक्रियाएँ पाप और पुण्य कहलाती हैं. पवित्र कर्मों द्वारा व्यक्ति उच्चतर ग्रहमंडलों की ओर उत्थित होता है, और अपवित्र गतिविधियों द्वारा व्यक्ति जीवन की निम्न प्रजातियों में पतित हो जाता है, जिसमें उसे प्रकृति के नियमों द्वारा दंड दिया जाता है. जीवन की निम्न प्रजातियों में एक विकास प्रक्रिया होती है, और जब जीव का कारावास या दंड समाप्त हो जाता है, उसे पुनः मानव रूप दिया जाता है और स्वयं तय करने का अवसर दिया जाता है कि वह किस दिशा में योजना बनाए. यदि वह फिर से अवसर चूक जाता है, तो उसे पुनः जन्म और मृत्यु के चक्र में फेंक दिया जाता है, संसार चक्र, भौतिक अस्तित्व के पहिए को घुमाते हुए वह कभी ऊपर जाता है और कभी नीचे. जैसे-जैसे पहिया कभी ऊपर और कभी नीचे जाता है, भौतिक प्रकृति के कड़े नियम भौतिक अस्तित्व में जीव को कभी सुखी और कभी दुखी बनाते हैं. ”

 

स्रोत- अभय चरणारविंद भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद (2014 संस्करण, अंग्रेजी), “श्रीमद् भागवतम्”, सातवाँ सर्ग, खंड 13- पाठ 30

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