भगवद-गीता (9.25) में कहा गया है, पितृन् यन्ति पितृ-व्रताः. जो लोग परिवार कल्याण में रुचि रखते हैं, उन्हें पितृ-व्रता कहा जाता है. पितृलोक नामक एक ग्रह है, और उस ग्रह के प्रधान देवता को आर्यमा कहा जाता है. वे कुछ-कुछ देवता हैं, और उन्हें संतुष्ट करके, व्यक्ति भूत बने हुए पारिवारिक सदस्यों को एक स्थूल शरीर पाने में सहायता कर सकता है. जो लोग बहुत पापी होते हैं और अपने परिवार, घर, गाँव या देश से बहुत आसक्त होते हैं, उन्हें भौतिक तत्वों से बना स्थूल शरीर नहीं मिलता है, बल्कि वे एक मन, अहंकार और बुद्धि से बने सूक्ष्म शरीर में रहते हैं. ऐसे सूक्ष्म शरीरों में रहने वालों को भूत कहा जाता है. यह भूतिया स्थिति बहुत कष्टमय होती है क्योंकि एक भूत के पास बुद्धि, मन और अहंकार होता है और वह भौतिक जीवन का आनंद लेना चाहता है, लेकिन चूँकि उसके पास स्थूल भौतिक शरीर नहीं होता है, वह भौतिक संतुष्टि की इच्छा से केवल व्यवधान उत्पन्न कर सकता है. परिवार के सदस्यों, विशेष रूप से पुत्र, का कर्तव्य होता है कि वह देवता आर्यमा या भगवान विष्णु को हव्य अर्पित करे. भारत में अनादिकाल से किसी मृत व्यक्ति का बेटा गया जाता है और वहाँ के एक विष्णु मंदिर में अपने भूत पिता के लाभ के लिए तर्पण करता है. ऐसा नहीं है कि हर किसी के पिता भूत बन जाते हैं, लेकिन भगवान विष्णु के चरण कमलों को पिंड का अर्पण किया जाता है ताकि यदि परिवार का कोई सदस्य भूत बन जाए, तो उसे स्थूल शरीर प्रदान किया जाए. हालाँकि, अगर किसी ने भगवान विष्णु का प्रसाद लेने वृत्ति धारण की है, तो उसके भूत या मनुष्य से हीन बनने की कोई संभावना नहीं होती. वैदिक सभ्यता में श्राद्ध नामक एक अनुष्ठान होता है जिसके द्वारा आस्था और भक्ति के साथ भोजन का हव्य अर्पण किया जाता है. यदि कोई विश्वास और भक्ति के साथ भगवान विष्णु के चरण कमलों में या पितृलोक में उनके प्रतिनिधि, आर्यमा के चरण कमलों में हव्य अर्पण करता है– तो उसके पूर्वज उनके लिए अर्ह भौतिक भोग का आनंद लेने के लिए भौतिक शरीर प्राप्त करेंगे. दूसरे शब्दों में उन्हें भूत नहीं बनना पड़ेगा.

स्रोत: अभय चरणारविंद भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद (2014, अंग्रेजी संस्करण), “श्रीमद्-भागवतम” चतुर्थ सर्ग, अध्याय 18 – पाठ 18

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