“भागवतम के ग्यारहवें सर्ग (11.2.37) में भगवान से भिन्न होने की झूठी अवधारणा का वर्णन किया गया है: भयं द्वितियाभिनिवेशतः स्याद ईशाद अपेतस्य विपर्ययो स्मृति: . यद्यपि सारा अस्तित्व परम सत्य, कृष्ण, से निकलता है हम एक “”अन्य वस्तु”” की कल्पना करते हैं, इस भौतिक संसार के, भगवान के अस्तित्व से संपूर्ण रूप से भिन्न होने की. इस मानसिकता के साथ, हम अपनी इन्द्रियतृप्ति के लिए उस “”अन्य वस्तु”” का शोषण करने का प्रयास करते हैं. अतः भौतिक जीवन का मनोवैज्ञानिक आधार यह भ्रम है कि यह संसार किसी तरह भगवान से भिन्न है और इसलिए हमारे भोग के लिए है.

यह विडंबना है कि अवैयक्तिक दार्शनिक, इस संसार के अपने कट्टरपंथी त्याग में, इसे पूर्णरूपेण झूठा और परम से बिलकुल भिन्न होने का दावा करते हैं. दुर्भाग्य से, इस संसार को उसकी दिव्य प्रकृति से या, दूसरे शब्दों में, भगवान से उसका संबंध तोड़ने का यह कृत्रिम प्रयास, लोगों को इसे सर्वथा अस्वीकार करने के लिए नहीं बल्कि इसका आनंद लेने की चेष्टा करने के लिए प्रेरित करता है. जबकि यह सच है कि यह संसार अस्थायी है और इस प्रकार एक अर्थ में भ्रमपूर्ण है, भ्रम का तंत्र परम भगवान की आध्यात्मिक शक्ति है. इस बात को समझते हुए हमें इस संसार का दोहन करने के किसी भी प्रयास को तुरंत छोड़ देना चाहिए; बल्कि, हमें इसे भगवान की ऊर्जा के रूप में पहचानना चाहिए. हम वास्तव में अपनी भौतिक इच्छाओं का त्याग तभी करेंगे जब हम समझेंगे कि यह संसार भगवान का है और इसलिए यह हमारे स्वार्थ की पूर्ति के लिए नहीं है.”

स्रोत:अभय चरणारविंद भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद (2014 संस्करण, अंग्रेज़ी), श्रीमद् भागवतम्, दसवाँ सर्ग, अध्याय 38- पाठ 11

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