भौतिक संसार में तीन प्रकार के दुख होते हैं: आध्यात्मिक, अधिभौतिक और अधिदैविक. आध्यात्मिक का संबंध शरीर और मन से होता है. आज मुझे सिरदर्द या मेरी पीठ में कुछ दर्द है, या मेरा चित्त बहुत शांत नहीं है. ये कष्ट आध्यात्मिक कहलाते हैं. दुख के अन्य रूप अधिभौतिक कहलाते हैं, वे दुख जो अन्य जीवों द्वारा आरोपित किए जाते हैं. इन जीवों को बड़े होने की आवश्यकता भी नहीं होती- जैसे कीट – जो हमें तब भी बहुत कष्ट दे सकता है जब हम सो रहे हों. इसके अतिरिक्त, अधिदैविक कहलाने वाले दुख होते हैं, जिन पर हमारा कोई नियंत्रण नहीं होता. इनका कारण देवता या प्रकृति की गतिविधियाँ होती हैं, और इनमें अकाल, महामारी, बाढ़, अत्यधिक गर्मी या अत्यधिक ठंड, भूकंप, आग और ऐसी घटनाएँ शामिल होती हैं. तब भी, हम सोच रहे हैं कि हम इस भौतिक संसार में बहुत प्रसन्न हैं, यद्यपि इन त्रिविध कष्टों के अतिरिक्त जन्म, वृद्धावस्था, रोग और मृत्यु भी होते हैं. इस प्रकार भौतिक संसार में तीन प्रकार के दुख होते हैं, और प्रत्येक व्यक्ति इनमें से एक, दो, या तीनों की पीड़ा भोग रहा है. कोई भी नहीं कह सकता कि वह कष्टों से पूरी तरह से मुक्त है. फिर हम यह प्रश्न कर सकते हैं कि जीव कष्ट क्यों भुगत रहा है. उत्तर है: अज्ञान के कारण. वह विचार नहीं करता, “मैं गलतियाँ कर रहा हूँ और पापमय जीवन व्यतीत कर रहा हूँ; इस कारण मैं दुख भोगता हूँ.” इसलिए गुरु का पहला कार्य अपने शिष्य को इस अज्ञान से बचाना है. हम अपने बच्चों को कष्टों से बचाने के लिए स्कूल भेजते हैं. यदि हमारे बच्चे शिक्षा प्राप्त नहीं करते, तो हमें भय रहता है कि भविष्य में उन्हें कष्ट रहेगा. गुरु देख लेता है कि वह कष्ट अज्ञान के कारण है, जिसकी तुलना अंधकार से की जाती है. जो अंधकार में हो उसे कैसे बचाया जा सकता है? प्रकाश द्वारा, गुरु ज्ञान का दीपक लेता है और उसे अंधकार में ढंके जीव तक ले आता है. यही ज्ञान उसे अज्ञान के अंधकार के दुखों से मुक्त करता है.

स्रोत: अभय चरणारविंद भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद (2007, अंग्रेजी संस्करण). “देवाहुति पुत्र, भगवान कपिल की शिक्षाएँ”, पृ. 62
अभय चरणारविंद भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद (2014, अंग्रेजी संस्करण), “आत्म साक्षात्कार का विज्ञान” पृ. 63

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