भौतिक संसार की रचना के समय से, दो प्रकार के पुरुष हुए हैं–देव और असुर. देव भगवान के परम व्यक्तित्व के प्रति सदैव निष्ठावान होते हैं, जबकि असुर सदैव नास्तिक होते हैं जो भगवान की सत्ता की अवहेलना करते हैं. वर्तमान समय में, समस्त संसार में, नास्तिक बहुत बड़ी संख्या में हैं. वे सिद्ध करना चाहते हैं कि कोई भगवान नहीं हैं और सब कुछ भौतिक तत्वों के योग-संयोग से घटित होता है. अतः भौतिक संसार अधिकाधिक भगवान विहीन बनता जा रहा है, और परिणाम स्वरूप सब कुछ विच्छिन्न स्थिति में है. यदि ऐसा जारी रहता है, तो भगवान के परम व्यक्तित्व निश्चित ही उचित चरण उठाएँगे, जैसा कि उन्होंने हिरण्यकशिपु के प्रसंग में किया था. क्षण भर में ही, हिरण्यकशिपु और उसके अनुयायी नष्ट हो गए थे, और उसी प्रकार यदि यह भगवानविहीन सभ्यता चलती रही, तो इसका नाश, भगवान के परम व्यक्तित्व की अंगुली की गति भर से क्षण भर में हो जाएगा. इसलिए असुरों को सावधान होना चाहिए और उनकी भगवानविहीन सभ्यता को सीमित करना चाहिए. उन्हें कृष्ण चेतना आंदोलन का लाभ लेना चाहिए और भगवान के परम व्यक्तित्व के प्रति निष्ठावान बन जाना चाहिए; अन्यथा वे अभिशप्त हैं. जैसे हिरण्यकशिपु क्षण भर में मारा गया था, भगवानविहीन सभ्यता भी किसी भी क्षण नष्ट हो सकती है.

 

स्रोत- अभय चरणारविंद भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद (2014 संस्करण, अंग्रेजी), “श्रीमद् भागवतम्”, सातवाँ सर्ग, खंड 08- पाठ 31

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