“जैसा कि वैदिक साहित्य (भग. 11.20.17):
नृ देहम अद्यम सुलभम सुदुर्लभम प्लावम सुकल्पम गुरु-कर्ण-धरम्

हम, बद्ध आत्माएँ, निस्सारता के सागर में गिरी हुई हैं, किंतु मानव शरीर हमें इस सागर को पार करने का अच्छा अवसर प्रदान करता है क्योंकि मानव शरीर एक बहुत अच्छी नौका जैसा होता है. जब कप्तान के रूप में किसी आध्यात्मिक गुरु द्वारा निर्देशित होती है, तो नौका बहुत सरलता से सागर को पार कर सकती है. साथ ही, नौका को अनुकूल पवन की सहायता मिलती है, जो कि वैदिक ज्ञान के निर्देश होते हैं. यदि व्यक्ति निस्सारता के इस सागर को पार करने की इन सुविधाओं का लाभ नहीं लेता, तो वह निश्चित ही आत्महत्या कर रहा है.

जो पत्थर से बनी नाव पर सवार होता है, वह अभिशप्त होता है. श्रेष्ठता के स्तर तक उठने के लिए, मानवता को पहले झूठे नेताओं का त्याग करना होगा जो पत्थर की नौका प्रस्तुत करते हैं. समस्त मानव समाज ऐक ऐसी खतरनाक स्थिति में है कि बचने के लिए उसे वेद के मानक निर्देशों का पालन करना ही होगा. इन निर्देशों का सार भगवद्-गीता के रूप में प्रकट होता है. वयक्ति को किसी अन्य निर्देश की शरण नहीं लेनी चाहिए, क्योंकि भगवद्-गीता यह निर्देश प्रत्यक्ष देती है कि मानव जीवन के लक्ष्य की पूर्ति कैसे करना है. इसलिए भगवान कृष्ण कहते हैं, सर्व-धर्मन् परित्याज्य मम एकम् शरणम् व्रज : “धर्म की अन्य सभी प्रक्रियाएँ त्याग दो और केवल मेरी शरण में आ जाओ.” भले ही व्यक्ति भगवान कृष्ण को भगवान के परम व्यक्तित्व के रूप में नहीं स्वीकारता, तो भी उनके निर्देश मानवता के लिए इतने असाधारण और लाभदायक हैं कि यदि कोई उनके निर्देशों का पालन करता है तो वह तर जाएगा. अन्यथा व्यक्ति अप्रामाणिक ध्यान और योग की करतबों वाली विधि द्वारा छला जाएगा. अतः व्यक्ति पत्थर की ऐसी नौका में बैठ जाएगा जो डूब जाएगी और उसके सभी यात्री डूब जाएंगे.”

अभयचरणारविंद भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद (2014 संस्करण, अंग्रेजी), “श्रीमद् भागवतम”, छठा सर्ग, अध्याय 7- पाठ 14

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