स्वस्मत शब्द का अर्थ है “स्वयं से.” धन की आसक्ति के कारण सबसे धनी व्यक्ति भी स्वयं से डरता है. उसे भय रहता है कि उसने अपना धन असुरक्षित रूप से ताले में बंद किया है या कुछ त्रुटि की है. सरकार और उसके आय कर के अतिरिक्त और चोरों के अतिरिक्त, किसी धनी व्यक्ति को स्वयं के सबंधी सदैव सोचते हैं कि उससे लाभ कैसे लिया जाए और उसका धन कैसे प्राप्त किया जाए. कभी-कभी इन संबंधियों का वर्णन स्व जनक-दस्यु के रूप में किया जाता है, जिसका अर्थ होता है “संबंधियों के रूप में दुष्ट और चोर.” इसलिए, संपत्ति जमा करने या अधिकाधिक धन के लिए अनावश्यक प्रयास करने की कोई आवश्यकता नहीं है. जीवन का वास्तविक उद्देश्य यह पूछना है “मैं कौन हूँ?” और स्वयं के आत्म, संसार को समझना, और समझना कि वापस परम भगवान तक, घर कैसे लौटना.

 

स्रोत- अभय चरणारविंद भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद (2014 संस्करण, अंग्रेजी), “श्रीमद् भागवतम्”, सातवाँ सर्ग, खंड 13- पाठ 33

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