एक दुर्लभ परिस्थिति में जब अनाज की आपूर्ति नहीं होती है, तो सरकार मांस खाने की अनुमति दे सकती है. यद्यपि जब पर्याप्त भोजन उपलब्ध हो, तो सरकार को केवल सरलता से न संतुष्ट होने वाली जिव्हा की संतुष्टि के लिए गौमांस खाने की अनुमति नहीं देनी चाहिए. दूसरे शब्दों में, दुर्लभ परिस्थितियों में, जब लोग अन्न के लिए व्याकुल हों, तब मांस खाने की अनुमति दी जा सकती है, परंतु अन्यथा नहीं. जिव्हा की संतुष्टि और अनावश्यक रूप से पशुओं की हत्या के लिए वधशालाओं के परिपालन को कभी भी सरकार द्वारा अनुमति नहीं दी जानी चाहिए. जैसा कि पिछले श्लोक में वर्णित है, गायों और अन्य पशुओं को खाने के लिए पर्याप्त घास दी जानी चाहिए. यदि घास की पर्याप्त आपूर्ति के बावजूद कोई गाय दूध की आपूर्ति नहीं करती है, और यदि भोजन की तीव्र कमी है, तो कृश-काय गौ का उपयोग भूखे लोगों को खिलाने के लिए किया जा सकता है. आवश्यकता के नियम के अनुसार, सबसे पहले मानव समाज को खाद्यान्न और सब्जियाँ उत्पन्न करने का प्रयास करना चाहिए, लेकिन यदि वे इसमें असफल होते हैं, तो वे मांस-भक्षण कर सकते हैं, अन्यथा नहीं. जैसा कि मानव समाज वर्तमान में संरचित है, पूरे विश्व में अन्न का पर्याप्त उत्पादन होता है. इसलिए वधशालाओं को खोलने का समर्थन नहीं किया जा सकता है. कुछ देशों में इतना अधिशेष अन्न होता है कि कभी-कभी अतिरिक्त अन्न समुद्र में फेंक दिया जाता है, और कभी-कभी सरकार अनाज के अतिरिक्त उत्पादन पर रोक लगा देती है. परिणामस्वरूप कुछ स्थानों पर अन्न की कमी होती है और दूसरों स्थानों में विपुल उत्पादन होता है. यदि अन्न के वितरण को संभालने के लिए पृथ्वी पर एक ही शासन होता, तो वधशालाएँ खोलने की आवश्यकता नहीं होती, और अति- जनसंख्या के बारे में झूठे सिद्धांत प्रस्तुत करने की आवश्यकता नहीं होती.

स्रोत: अभय चरणारविंद भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद (2014, अंग्रेजी संस्करण), “श्रीमद्-भागवतम” चतुर्थ सर्ग, अध्याय 17 – पाठ 25

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