श्रील सुकदेव गोस्वामी बताते हैं कि नारद मुनि ने राजा प्रियव्रत को मानव जीवन के लक्ष्य के बारे में सटीक निर्देश दिया था. मानव जीवन का लक्ष्य व्यक्ति के आत्म का अनुभव करना है और फिर धीरे-धीरे वापस घर, परम भगवान तक लौटना है. चूँकि नारद मुनि ने इस विषय पर राजा को पूर्ण रूपेण निर्देश दिया, तो उन्होंने फिर से गृहस्थ जीवन में प्रवेश क्यों किया, जो भौतिक बंधन का मुख्य कारण है? महाराजा परीक्षित बहुत चकित थे कि राजा प्रियव्रत गृहस्थ जीवन में बने रहे, विशेषकर चूँकि वे न केवल आत्म-ज्ञानी थे, बल्कि भगवान के प्रथम श्रेणी के भक्त भी थे. एक भक्त को वास्तव में गृहस्थ जीवन के लिए कोई आकर्षण नहीं होता है, लेकिन आश्चर्यजनक रूप से, राजा प्रियव्रत ने गृहस्थ जीवन का बहुत आनंद लिया. कोई यह तर्क दे सकता है, “गृहस्थ जीवन का आनंद लेना गलत क्यों है?” इसका उत्तर यह है कि गृहस्थ जीवन में व्यक्ति भ्रामक गतिविधियों के परिणामों से बंध जाता है. गृहस्थ जीवन का सार इंद्रिय भोग है, और जब तक व्यक्ति अपने मन को इंद्रिय भोग के लिए कड़ी मेहनत करने में लगाता है, तब तक व्यक्ति भ्रामक गतिविधियों की प्रतिक्रियाओं से बंधा होता है. आत्म-साक्षात्कार की यह अज्ञानता मानव जीवन की सबसे बड़ी हार है. जीवन का मानवीय रूप विशेष रूप से भ्रामक गतिविधियों के बंधन से बाहर निकलने के लिए है, लेकिन जब तक व्यक्ति अपने जीवन के लक्ष्य के प्रति विस्मृति मे रहता है और एक सामान्य प्राणी के जैसे व्यवहार करता है – भोजन करना, सोना, संभोग करना और बचाव करना – उसे भौतिक अस्तित्व के अपने बद्ध जीवन को जारी रखना पड़ेगा. ऐसे जीवन को स्वरूप-विस्मृति, व्यक्ति की वैधानिक स्थिति की विस्मृति, कहा जाता है. इसलिए वैदिक सभ्यता में व्यक्ति को जीवन की शुरुआत में ही ब्रह्मचारी के रूप में प्रशिक्षित किया जाता है. एक ब्रह्मचारी को तपस्या करनी चाहिए और संभोग लिप्तता से बचना चाहिए. इसलिए यदि कोई ब्रह्मचर्य के सिद्धांतों में पूरी तरह प्रशिक्षित है, तो वह सामान्यतः गृहस्थ जीवन में प्रवेश नहीं करता है. उसके बाद उन्हें नैष्टिक-ब्रह्मचारी कहा जाता है, जो संपूर्ण ब्रह्मचर्य का संकेत देता है. इस प्रकार राजा परीक्षित आश्चर्यचकित थे कि महान राजा प्रियव्रत ने गृहस्थ जीवन में प्रवेश किया, यद्यपि वे नैष्टिक-ब्रह्मचर्य के सिद्धांतों में प्रशिक्षित थे.

स्रोत: अभय चरणारविंद भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद (2014, अंग्रेजी संस्करण), “श्रीमद्-भागवतम” पांचवाँ सर्ग, अध्याय 1 – पाठ 1

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