सामान्यतः बेटी को अपने पिता की योग्यता प्राप्त करती है, और बेटा माँ की योग्यताओं को प्राप्त करता है. अतः, स्वयंसिद्ध सत्य के अनुसार कि एक ही वस्तु की समकक्ष वस्तुएँ एक दूसरे के समकक्ष होती हैं, राजा अंग से पैदा हुआ बच्चा अपने नाना का अनुयायी बन जाता है. स्मृति-शास्त्र के अनुसार, एक बच्चा सामान्यतः अपने मामा के घर के सिद्धांतों का पालन करता है. नारनम मातुल-कर्म का अर्थ है कि एक बच्चा सामान्यतः अपने मातृ परिवार के गुणों का पालन करता है. यदि मातृ परिवार बहुत ही भ्रष्ट या पापी है, तो बच्चा, भले ही एक अच्छे पिता से पैदा हुआ हो, मातृ परिवार का पीड़ित बन जाता है. इसलिए, वैदिक सभ्यता के अनुसार, विवाह होने से पहले लड़के और लड़की दोनों के परिवारों की पड़ताल की जाती है. यदि ज्योतिषीय गणना के अनुसार संयोजन सही है, तो विवाह होता है. यद्यपि कभी-कभी, कोई त्रुटि हो जाती है, और पारिवारिक जीवन निराशाजनक हो जाता है. ऐसा प्रतीत होता है कि राजा अंग को सुनीता के रूप में बहुत अच्छी पत्नी नहीं मिली क्योंकि वह मृत्यु के व्यक्ति रूप की पुत्री थी. कभी-कभी भगवान अपने भक्त के लिए एक दुर्भाग्यकारी पत्नी की व्यवस्था करते हैं ताकि धीरे-धीरे, पारिवारिक परिस्थितियों के कारण, भक्त अपनी पत्नी और घर से अलग हो जाता है और भक्ति जीवन में प्रगति करता है. ऐसा प्रतीत होता है कि भगवान के परम व्यक्तित्व की व्यवस्था द्वारा,राजा अंग, यद्यपि एक पवित्र भक्त, को भी सुनीता जैसी दुर्भाग्यकारी पत्नी मिली और बाद में वेण जैसा बुरा पुत्र मिला. लेकिन इसका परिणाम यह हुआ कि उन्हें पारिवारिक जीवन के उलझाव से पूरी तरह से मुक्ति मिल गई और वे वापस परम भगावन तक पहुँचने के लिए घर से निकल गए.

स्रोत: अभय चरणारविंद भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद (2014, अंग्रेजी संस्करण), “श्रीमद्-भागवतम” चतुर्थ सर्ग, अध्याय 13 – पाठ 39

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