“मायावी भौतिक प्रकृति क्षुद्र जीव को आलिंगन करने के लिए आकर्षित करती है, और परिणामस्वरूप वह उसके गुणों से निर्मित रूपों को ग्रहण करता है. इसके बाद, वह अपने सभी आध्यात्मिक गुणों को खो देता है और उसे बार-बार मृत्यु भोगना पड़ती है. यद्यपि जीव शुद्ध आत्मा, गुणात्मक रूप से परम भगवान के समकक्ष होता है, भौतिक भ्रम की अज्ञानता को अपनाने के कारण उसके पतित होने की संभावना होती है. जब वह माया के आकर्षण से मोहित हो जाता है, तो वह ऐसे शरीर और इंद्रियों को स्वीकार करता है जिनकी रचना उसे विस्मृति में लिप्त करने के लिए की गई है. माया के तीन गुणों की कच्ची सामग्री – साधुता, लालसा और अज्ञान – से उत्पन्न ये शरीर आत्मा को विभिन्न प्रकार के दुःखों से ढँक देते हैं, जिसकी परिणति मृत्यु और पुनर्जन्म में होती है.

परम आत्मा और वैयक्तिक आत्मा एक ही आध्यात्मिक प्रकृति साझा करते हैं, लेकिन परम आत्मा अपने असीम सहचर के समान अज्ञानता में नहीं फँस सकती. धुआँ तांबे के एक छोटे से पिघले हुए गोले की चमक को घेर सकता है, इसके प्रकाश को अंधेरे में ढँक सकता है, किंतु सूर्य के विशाल पिंड को कभी भी उस प्रकार का ग्रहण नहीं लगेगा. माया, अंततः, भगवान की निष्ठावान दासी का व्यक्तित्व, भगवान की आंतरिक, योग-माया शक्ति का बाह्य विस्तार ही होती है.”

स्रोत:अभय चरणारविंद भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद (2014 संस्करण, अंग्रेज़ी), श्रीमद् भागवतम्, दसवाँ सर्ग, अध्याय 87- पाठ 38

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