सामान्यतः एक संत व्यक्ति वन में किसी दूरस्थ स्थान पर या एक साधारण कुटिया में रहता है. यद्यपि, हमें ध्यान देना चाहिए कि समय बदल गया है. किसी संत स्वभाव के लिए वन में जाना और कुटिया में रहना उसके स्वयं के हित में हो सकता है, लेकिन यदि कोई उपदेशक बन जाता है, विशेष रूप से पश्चिमी देशों में, तो उसे विभिन्न वर्ग के लोगों को आमंत्रित करना पड़ता है, जो आरामदायक अपार्टमेंट में रहने के अभ्यस्त होते हैं. इसलिए इस युग में संत व्यक्ति को लोगों की यजमानी करने और उन्हें कृष्ण चेतना के संदेश के लिए आकर्षित करने के लिए उचित व्यवस्था करनी पड़ती है. शायद पहली बार, श्रील भक्तिसिद्धान्त सरस्वती ठाकुर ने बड़े शहरों में केवल सामान्य जनता को आकर्षित करने हेतु संत व्यक्तियों के लिए मोटरसाइकल और भव्य भवनों को प्रस्तुत किया. मुख्य तथ्य यह है कि व्यक्ति को किसी संत व्यक्ति से जुड़ना होगा. इस युग में लोग संत की खोज करने वन में नहीं जाने वाले, इसलिए संतों और मुनियों को सामान्य लोगों को आमंत्रित करने के लिए व्यवस्था करने हेतु बड़े शहरों में आना पड़ता है, जो भौतिक जीवन की आधुनिक सुविधाओं के अभ्यस्त हैं. धीरे-धीरे ऐसे व्यक्ति सीखेंगे कि महलनुमा भवन या आरामदायक अपार्टमेंट बिल्कुल भी आवश्यक नहीं हैं. वास्तविक आवश्यकता किसी भी विधि से भौतिक बंधनों से मुक्त बनना है. अनासक्तस्य विषयन यथार्हम उपयुंजतः निर्बंधः कृष्ण-संबंधे युक्तम वैराग्यम उच्यते “जब व्यक्ति किसी भी वस्तु से जुड़ा नहीं होता है, लेकिन साथ ही कृष्ण के संबंध में सब कुछ स्वीकार करता है, तो व्यक्ति सही ढंग से स्वामित्व भाव से ऊँची स्थिति में होता है.” (भक्ति-रसामृत-सिंधु 1.2.255) व्यक्ति को भौतिक वैभव से आसक्त नहीं होना चाहिए, लेकिन कृष्ण चेतना आंदोलन में भौतिक वैभव को स्वीकार किया जा सकता है, ताकि आन्दोलन का प्रसार किया जा सके. दूसरे शब्दों में, भौतिक वैभव को युक्त-वैराग्य के रूप में स्वीकार किया जा सकता है, अर्थात् त्याग के लिए.

स्रोत: अभय चरणारविंद भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद (2014, अंग्रेजी संस्करण), “श्रीमद्-भागवतम” चतुर्थ सर्ग, अध्याय 29 – पाठ 55

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