जब तक मैं ऐसा सोचता हूँ, “मेरा इस परिवार से संबंध है,” “मेरा इस राष्ट्र से संबंध है,” “मैं इस धर्म से संबंध रखता हूँ,” “मैं इस रंग से संबंध रखता हूँ,” और आगे, कृष्ण चैतन्य होने की कोई संभावना नहीं है. जब तक व्यक्ति स्वयं को अमेरिकी, भारतीय, या अफ्रीकी मानता है, स्वयं का इस या उस परिवार से संबंध मानता है, या वह इस या उस व्यक्ति को पिता, माता, पति, या पत्नी समझता है, तब तक वह व्यक्ति भौतिक प्रयोजन से बंधा रहता है. मैं आत्मा हूँ, और ये सभी बंधन शरीर से संबंधित होते हैं, लेकिन मैं यह शरीर नहीं हूँ. यही समझ का सार है. यदि मैं यह शरीर नहीं हूँ, तो मैं किसका पिता या किसकी माता हूँ? सर्वोच्च पिता और माता कृष्ण हैं. हम केवल पिता, माता, बहन, या भाई होने की भूमिका निभा रहे हैं, जैसे रंगमंच पर निभाते हैं. भौतिक प्रकृति, माया, यह कहते हुए हमें नचा रही है, “तुम इस परिवार के सदस्य हो और इस राष्ट्र के सदस्य हो.” और इसलिए हम बंदरों के समान नाच रहे हैं. एक विशुद्ध भक्त अपने परिवार के लिए स्नेह के सीमित बंधन को काट देता है और सभी विस्मृत आत्माओं के लिए अपनी आध्यात्मिक गतिविधियों को विस्तृत करता है. एक सामान्य उदाहरण छः गोस्वामियों के दल का है, जिन्होंने भगवान चैतन्य के मार्ग का अनुसरण किया. जिन सभी का संबंध उच्चतर जाति के सबसे जागृत और सुसंस्कृत परिवारों के साथ था, लेकिन जन-सामान्य के लाभ के लिए उन्होंने अपने आरामदायक घरों को छोड़ दिया और भिक्षुक बन गए. पारिवारिक स्नेह से अलग होने का अर्थ गतिविधियों का विस्तार करना है. बिना यह किए, कोई भी ब्राम्हण, राजा, जन-नेता, या भगवान का भक्त होने की योग्यता नहीं पाता. एक आदर्श राजा के रूप में, भगवान के परम व्यक्तित्व ने इसे एक उदाहरण से बताया है. श्री रामचंद्र ने एक आदर्श राजा के गुणों को प्रकट करने के लिए अपनी प्यारी पत्नी के स्नेह के बंधन को काट दिया था. एक ब्राम्हण, भक्त, राजा, या एक जन-नेता के रूप में ऐसे व्यक्तियों को अपने संबंधित कर्तव्यों को पूरा करने हेतु बहुत खुले चित्त का होना चाहिए. श्रीमती कुंतीदेवी इस तथ्य के प्रति सचेत थीं, और दुर्बल होने के कारण उन्होंने ऐसे पारिवारिक स्नेह के बंधन से मुक्त होने के लिए प्रार्थना की. भगवान को ब्रम्हांड का भगवान, या सार्वभौमिक चित्त का स्वामी के रूप में संबोधित किया जाता है, जो पारिवारिक स्नेह की कड़ी गाँठ को काट देने की उनकी योग्यता दर्शाता है. इसलिए, कभी-कभी ऐसा अनुभव किया जाता है कि भगवान, अपने अशक्त भक्त के प्रति विशेष अनुरक्ति के चलते, पारिवारिक स्नेह को उनकी सर्व-शक्तिमान ऊर्जा द्वारा रचाई गई परिस्थितियों के बल से खंडित कर देते हैं. ऐसा करके वे भक्त को संपूर्ण रूप से स्वयं पर निर्भर बना देत हैं और इस प्रकार परम भगवान तक वापस जाने का उसका मार्ग सपष्ट कर देते हैं.

स्रोत: अभय चरणारविंद भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद (2014, अंग्रेजी संस्करण), “रानी कुंती की शिक्षाएँ” पृ. 109 व 194

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