“भौतिक संसार में कई वर्षों के यौन संबंधों और आनंद के बाद, राजा ययाति अंततः इस प्रकार के भौतिक सुख से निराश हो गए. भौतिक भोग से तृप्त होने पर, उन्होंने स्वयं के जीवन के अनुरूप एक बकरे और बकरी की कथा रचित की, और अपनी प्रिय देवयानी को वह कथा सुनाई. कथा इस प्रकार है. एक बार की बात है, जब एक बकरा जंगल में खाने के लिए तरह-तरह की वनस्पतियाँ ढूँढ रहा था, तब संयोग से वह एक कुएँ के पास आ गया, जिसमें उसे एक बकरी दिखाई दी. वह इस बकरी के प्रति आकर्षित हो गया और किसी प्रकार से उसे कुएँ से छुड़ाया, और इस प्रकार वे एक हो गए. उसके एक दिन बाद, जब बकरी ने देखा कि वह बकरा किसी अन्य मादा-बकरी के साथ यौन संबंध का आनंद ले रहा है, तो वह क्रोधित हो गई, उसने बकरे को त्याग दिया, और अपने ब्राह्मण मालिक के पास लौट आई, जिसे उसने अपने पति के व्यवहार का वर्णन कह सुनाया. ब्राह्मण बहुत क्रोधित हुआ और उसने नर-बकरे को अपनी यौन शक्ति खोने का श्राप दिया. इसके बाद, नर- बकरे ने ब्राह्मण से क्षमा मांगी और उसे यौन शक्ति वापस दे दी गई. फिर उस बकरे ने कई वर्षों तक उस बकरी के साथ मैथुन का आनन्द लिया, पर फिर भी वह सन्तुष्ट नहीं हुआ. यहाँ महाराज ययाति ने अपनी तुलना एक नर-बकरे से और देवयानी की तुलना एक मादा-बकरी से की है और पुरुष और स्त्री के स्वभाव का वर्णन किया है. किसी नर-बकरे के समान, पुरुष इन्द्रियतृप्ति की खोज करता रहता है, और पुरुष या पति के आश्रय के बिना एक स्त्री कुएँ में गिरी हुई बकरी के समान होती है. किसी पुरुष द्वारा देखभाल किए जाने के अभाव में, एक स्त्री सुखी नहीं रह सकती. निस्संदेह, वह एक मादा-बकरी के समान होती है जो कुँए में गिर गई है और अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रही है. अतः स्त्री को अपने पिता की शरण में रहना चाहिए, जैसा कि देवयानी ने किया था जब वह शुक्राचार्य की देखभाल में थी, और फिर पिता को उसका कन्यादान किसी उपयुक्त पुरुष को कर देना चाहिए, या उपयुक्त पुरुष को स्त्री को अपनी देखभाल में रखकर उसकी सहायता करनी चाहिए. यह देवयानी के जीवन से स्पष्ट रूप से दिखाया गया है. जब राजा ययाति ने देवयानी को कुएँ से छुड़ाया, तो उन्हें बड़ी राहत मिली और उन्होंने ययाति से अनुरोध किया कि वह उन्हें अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार करें.

यदि कोई वासनामयी और लालची है, तो इस संसार में सोने का कुल भंडार भी उसकी कामुक इच्छाओं को पूरा नहीं कर सकता है. ये इच्छाएँ आग के समान होती हैं. व्यक्ति धधकती अग्नि पर घी डाल सकता है, लेकिन अग्नि के बुझने की आशा नहीं की जा सकती. ऐसी अग्नि को बुझाने के लिए एक भिन्न प्रक्रिया अपनानी पड़ती है. इसलिए शास्त्र सुझाव देता है कि बुद्धि के द्वारा व्यक्ति भोग के जीवन को त्याग दे. जिनकी बुद्धि क्षीण होती है वे किसी महान प्रयास के बिना इन्द्रिय भोग को नहीं त्याग सकते, विशेषकर मैथुन के संबंध में, क्योंकि एक सुंदर स्त्री सबसे ज्ञानी पुरुष को भी भ्रमित कर देती है. यद्यपि राजा ययाति ने सांसारिक जीवन को त्याग दिया और अपनी संपत्ति अपने पुत्रों में बाँट दी. उन्होंने व्यक्तिगत रूप से एक भिक्षु, या संन्यासी के जीवन को अपनाया, भौतिक भोग के सभी आकर्षणों को त्याग दिया, और स्वयं को पूर्ण रूपेण भगवान की भक्ति सेवा में लगा दिया. इस प्रकार उन्होंने सिद्धि प्राप्त की. बाद में, जब उनकी प्रिय पत्नी, देवयानी, अपनी त्रुटिपूर्ण आचरण के जीवन से मुक्त हो गईं, तो उन्होंने भी स्वयं को भगवान की भक्ति सेवा में लगा लिया.”

स्रोत:अभय चरणारविंद भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद (2014 संस्करण, अंग्रेज़ी), श्रीमद् भागवतम्, नौवाँ सर्ग, अध्याय 19- परिचय और पाठ 3

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