यह एक गलत सिद्धांत है कि जनसंख्या में वृद्धि के कारण संसार पर अत्यधिक भार पड़ता है और इसलिए युद्ध और अन्य विनाशकारी प्रक्रियाएँ होती हैं. पृथ्वी पर कभी भी अधिक भार नहीं पड़ता है. पृथ्वी की सतह पर सबसे भारी पर्वतों और महासागरों में मानव जीवों की तुलना में अन्य जीव अधिक होते हैं, और उन पर अतिरिक्त भार नहीं पड़ता. यदि पृथ्वी की सतह पर सभी जीवेम की जनगणना की गई, तो निश्चित रूप से यह पाया जाएगा कि मनुष्यों की संख्या कुल जीवों की संख्या का पाँच प्रतिशत भी नहीं है. यदि मनुष्य की जन्मदर बढ़ रही है, तो अन्य जीवों की जन्मदर भी आनुपातिक रूप से बढ़ रही है. निम्नतर प्राणियों – पशुओं, जलीय जीवों, पक्षियों, आदि की जन्मदर – मनुष्य की तुलना में कहीं अधिक है. परम भगवान की व्यवस्था से पृथ्वी पर सभी जीवों के लिए भोजन की पर्याप्त व्यवस्था है, और यदि वास्तव में जीवित प्राणियों की अनुपातहीन वृद्धि हो तो वे और अधिक की व्यवस्था भी कर सकते हैं. इसलिए, जनसंख्या में वृद्धि के कारण कोई बोझ नहीं है. धर्म-ग्लानि, या भगवान की इच्छा के अनियमित निर्वहन के कारण पृथ्वी बोझिल हो गई है. भगवान जनसंख्या में वृद्धि के कारण नहीं बल्कि दुष्टों की वृद्धि पर अंकुश लगाने के लिए पृथ्वी पर प्रकट हुए थे, जैसा कि सांसारिक अर्थशास्त्रियों द्वारा त्रुटिपूर्ण ढंग से बताया जाता है. जब भगवान कृष्ण प्रकट हुए, तब दुष्टों की संख्या में पर्याप्त वृद्धि हुई थी जिन्होंने प्रभु की इच्छा का उल्लंघन किया था. भौतिक सृष्टि भगवान की इच्छा को पूरा करने के लिए है, और उनकी इच्छा यह है कि जो बद्ध आत्माएँ भगवान के राज्य में प्रवेश करने के लिए अयोग्य हैं, उन्हें प्रवेश करने के लिए अपनी स्थितियों में सुधार करने का अवसर मिले. ब्रह्मांडीय व्यवस्था की पूरी प्रक्रिया का उद्देश्य केवल बद्ध आत्माओं को भगवान के राज्य में प्रवेश करने का अवसर देना है, और भगवान की प्रकृति द्वारा उनके पालन की पर्याप्त व्यवस्था है. इसलिए, यद्यपि पृथ्वी की सतह पर जनसंख्या में भारी वृद्धि हो सकती है, यदि लोग सटीक रूप से ईश्वर चेतना के अनुरूप रहें और दुराचारी नहीं हों, तो पृथ्वी पर इस तरह का बोझ उसके लिए प्रसन्नता का एक स्रोत है. दो तरह के बोझ होते हैं. एक पशु का बोझ है और प्रेम का बोझ है. पशु का बोझ असहनीय है, लेकिन प्रेम का बोझ प्रसन्नता का एक स्रोत होता है. श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती प्रेम के बोझ का बहुत व्यावहारिक रूप से वर्णन करते हैं. उनका कहना है कि युवा पत्नी पर पति का बोझ, माँ की गोद में बच्चे का बोझ और व्यवसायी पर धन का बोझ, हालाँकि वास्तव में भारीपन के दृष्टिकोण से बोझ, आनंद के स्रोत होते हैं, और ऐसी बोझिल वस्तुओं की अनुपस्थिति में, व्यक्ति को अलगाव का बोझ अनुभव हो सकता है, जो प्रेम के वास्तविक बोझ से अधिक भारी होता है. जब भगवान कृष्ण ने पृथ्वी पर यदु वंश के बोझ का उल्लेख किया, तो उन्होंने पशु के बोझ से कुछ भिन्न का उल्लेख किया. भगवान कृष्ण से उत्पन्न हुए परिवार के सदस्यों की बड़ी संख्या कुछ लाखों तक थी और निश्चित रूप से पृथ्वी की जनसंख्या में काफी वृद्धि हुई थी, लेकिन चूँकि वे सभी उनके पारलौकिक पूर्ण विस्तार द्वारा स्वयं भगवान के विस्तार थे, इसलिए वे पृथ्वी के लिए बहुत प्रसन्नता का स्रोत थे. जब भगवान ने उन्हें पृथ्वी पर बोझ के संबंध में संदर्भित किया, तो उनके मन में पृथ्वी से उनके अनुपस्थित हो जाने की निकटता का ध्यान था. भगवान कृष्ण के परिवार के सभी सदस्य विभिन्न देवताओं के अवतार थे, और उन्हें भगवान के साथ पृथ्वी की सतह से अनुपस्थित हो जाना था. जब उन्होंने यदु वंश के संबंध में पृथ्वी पर असहनीय भारीपन का उल्लेख किया, तो वे उनके अलगाव के बोझ का उल्लेख कर रहे थे. श्रील जीव गोस्वामी इस निषकर्ष की पुष्टि करते हैं.

स्रोत: अभय चरणारविंद भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद (2014, अंग्रेजी संस्करण), “श्रीमद्-भागवतम” तीसरा सर्ग, अध्याय 03 – पाठ 14

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