सामान्यतः, जो गृहस्थ जीवन में होते हैं वे भौतिक परिणामों के लिए की गई गतिविधियों के क्षेत्र में इंद्रिय तुष्टि का अनुसरण करते हैं. ऐसे गृहमेधियों का जीवन में एकमेव लक्ष्य होता है–इंद्रिय तुष्टि. इसलिए कहा जाता है, यन् मैथुनादि-गृहमेधि-सुखम् हि तुच्छम् : गृहस्थ का जीवन इंद्रिय तुष्टि पर आधारित होता है, और इसलिए उससे अर्जित की गई प्रसन्नता बहुत तुच्छ होती है. तब भी, वैदिक प्रक्रिया इतनी व्यापक है कि गृहस्थ जीवन में भी व्यक्ति अपनी गतिविधियों को धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के नियामक सिद्धांतों के अनुसार समायोजित कर सकता है. व्यक्ति का लक्ष्य मुक्ति पाना होना चाहिए, किंतु व्यक्ति चूँकि इंद्रिय तुष्टि का त्याग नहीं कर पाता, शास्त्रों में धर्म, आर्थिक विकास, और इंद्रिय तुष्टि के सिद्धांतों का पालन करने की विधि का निर्देश दिया गया है. जैसा कि श्रीमद्-भागवतम् (1.2.9) में बताया गया है, धर्मस्य हि अपवर्गस्य न अर्थो अर्थयोपकल्पते: “सभी व्यावसायिक कार्यों का उद्देश्य परम मुक्ति होता है. उन्हें भौतिक लाभ के लिए नहीं करना चाहिए.” जो लोग गृहस्थ जीवन में हैं उन्हें ऐसा नहीं सोचना चाहिए कि धर्म गृहस्थ की इंद्रिय तुष्टि को बेहतर करने की प्रक्रिया है. गृहस्थ जीवन का उद्देश्य आध्यात्मिक ज्ञान में प्रगति करना भी होता है, जिसके द्वारा व्यक्ति अंततः भौतिक बंधन से मुक्ति पा सकता है. व्यक्ति को जीवन के परम लक्ष्य (तत्व जिज्ञासा) को समझने के उद्देश्य से ही गृहस्थ जीवन में रहना चाहिए. तब गृहस्थ जीवन किसी योगी के जीवन के समान होगी. जैसे ही व्यक्ति शास्त्रों की शिक्षाओं से विचलित होता है, वैसे ही गृहस्थ जीवन का उद्देश्य तुरंत भ्रम में खो जाता है.

स्रोत – अभय चरणारविंद स्वामी प्रभुपाद (2014 संस्करण, अंग्रेज़ी), “श्रीमद् भागवतम्” , आठवाँ सर्ग, अध्याय 16 – पाठ 5

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