“कृष्ण हर किसी के हृदय में साक्षी हैं, और वे हमारी सभी गतिविधियों को देख रहे हैं. हम उनसे कुछ भी नहीं छिपा सकते, और हम हमारे कर्मों का परिणाम पाते हैं क्योंकि कृष्ण हृदय में विद्यमान साक्षी हैं. फिर कैसे, हम उनसे बच सकते हैं? कृष्ण की आज्ञा के बिना, हम कुछ भी नहीं कर सकते. कृष्ण हमें कुछ भी त्रुटिपूर्ण करने की आज्ञा क्यों देते हैं? वे ऐसा करते हैं क्योंकि हम हठ करते हैं. वास्तव में वे हमें उनके प्रति समर्पण करने के अतिरिक्त कुछ भी नहीं कहते. हम कुछ करना चाहते हैं, और कृष्ण आज्ञा दे सकते हैं, लेकिन हम स्वयं अपने जोखिम पर आगे बढ़ कर उसे कर लेते हैं. कृष्ण उत्तरदायी नहीं हैं. यद्यपि, हमें ज्ञात होना चाहिए कि कृष्ण की आज्ञा के बिना हम कुछ नहीं कर सकते. यही सच है. वास्तव में वैधानिक रूप से हम कृष्ण के सेवक हैं. भले ही हम स्वयं को स्वतंत्र घोषित कर लें, हम हैं नहीं. बल्कि, हम सेवक होते हुए मिथ्या रूप में घोषित कर रहे हैं कि हम स्वतंत्र हैं. आत्म-साक्षात्कार यह समझने के लिए है कि हम भगवान के परम व्यक्तित्व पर निर्भर हैं. जैसा कि चैतन्य महाप्रभु कहते हैं:

अयि नंद-तनुजा किंकरम, पतितम् मम विषमे भावाम्बुधौ
कृपया तव पद-पंकजस्थित- धूलि-सदर्शम विचंतया

“”मेरे प्रिय भगवान कृष्ण, महाराजा नंद के पुत्र, मैं आपका शाश्वत सेवक हूँ, लेकिन किसी प्रकार से मैं इस नीचता के सागर में गिर गया हूँ. कृपया मृत्यु के इस महासागर से मेरा उत्थान करें और मुझे अपने चरण कमलों की धूलिकण के रूप में स्थान दें.”” (शिक्षाष्टक 5)

अभय चरणारविंद भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद (2007, अंग्रेजी संस्करण). “देवाहुति पुत्र, भगवान कपिल की शिक्षाएँ”, पृ. 69 व 70

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