इस श्लोक में कर निर्धारण की प्रक्रिया को बहुत अच्छी तरह से समझाया गया है. कर निर्धारण का उद्देश्य तथाकथित प्रशासनिक प्रमुखों की इंद्रिय तुष्टि करना नहीं है. अकाल या बाढ़ जैसी आपात स्थितियों के दौरान, कर राजस्व को आवश्यकता के समय नागरिकों में वितरित किया जाना चाहिए. कर राजस्व को सरकारी सेवकों के बीच उच्च वेतन और विभिन्न अन्य भत्तों के रूप में कभी भी वितरित नहीं किया जाना चाहिए. हालांकि कलियुग में, नागरिकों की स्थिति बहुत भयानक है क्योंकि कर इतने सारे रूपों में लगाए जाते हैं और प्रशासकों की व्यक्तिगत सुख-सुविधाओं के लिए खर्च किए जाते हैं. इस श्लोक में सूर्य का उदाहरण बहुत उपयुक्त है. सूर्य पृथ्वी से कई लाख मील दूर है, और यद्यपि सूर्य वास्तव में पृथ्वी को स्पर्श नहीं करता है, वह महासागरों और समुद्रों से पानी निकालकर पूरे ग्रह पर भूमि वितरित करने का प्रबंधन करता है, और वह बरसात के मौसम में पानी का वितरण करके उस भूमि को उपजाऊ बनाने का प्रबंधन करता है. एक आदर्श राजा के रूप में, राजा पृथु सूर्य के जैसी ही कुशलता से गांव और राज्य में इन सारी गतिविधियों को निष्पादित करते. यहाँ राजा पृथु की तुलना सहनशीलता के प्रसंग में पृथ्वी ग्रह से की गई है. यद्यपि पृथ्वी को हमेशा मानवों और जानवरों द्वारा रौंदा जाता है, फिर भी वह अनाज, फल और सब्जियां पैदा करके उन्हें भोजन प्रदान करती है. एक आदर्श राजा के रूप में, महाराजा पृथु की तुलना सांसार ग्रह से की जाती है, भले ही कुछ नागरिक राज्य के नियमों और विनियमों का उल्लंघन कर सकते हैं, फिर भी वे सहिष्णु रहेंगे और फल और अनाज के साथ उनका पालन करते रहेंगे. दूसरे शब्दों में, नागरिकों की सुख-सुविधाओं की देखभाल करना राजा का कर्तव्य है, यहाँ तक कि अपनी निजी सुविधा के मूल्य पर भी. यद्यपि, कलियुग में ऐसा नहीं है, क्योंकि कलयुग में राजा और राज्य के प्रमुख लोग जीवन का आनंद नागरिकों से प्राप्त करों की लागत पर लेते हैं. इस तरह के अनुचित कराधान लोगों को कपटी बनाते हैं, और लोग अपनी आय को बहुत सी विधियों से छिपाने का प्रयास करते हैं. अंततः राज्य करों को संचित करने में सक्षम नहीं होंगे और परिणामस्वरूप अपने विशाल सैन्य और प्रशासनिक खर्चों को पूरा करने में सक्षम नहीं होंगे. सब कुछ ढह जाएगा, और पूरे राज्य में अराजकता और अशांति होगी.

स्रोत: अभय चरणारविंद भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद (2014, अंग्रेजी संस्करण), “श्रीमद्-भागवतम” चतुर्थ सर्ग, अध्याय 16 – पाठ 6 व 7

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