“चाणक्य पंडित ने विमर्श दिया है, विश्वासो नैव कर्तव्यः स्त्रीषु राज-कुलेषु च: “”कभी भी किसी स्त्री या राजनेता पर अपनी निष्ठा न रखें”” जब तक व्यक्ति आध्यात्मिक चेतना तक ऊंचा न उठा हो, वह बद्ध और पतित होता है, स्त्रियों का कहना ही क्या, जो पुरुषों से कम बुद्धिमान होती हैं. स्त्रियों की तुलना शूद्रों और वैश्यों से की गई है. यद्यपि आध्यात्मिक धरातल पर, जब कोई कृष्ण चेतना के स्तर तक ऊंचाई पा लेता है, तो चाहे वह पुरुष हो, स्त्री हो, शूद्र या जो भी हो, सभी समान होते हैं. अन्यथा, उर्वशी, जो स्वयं एक स्त्री थी और जो स्त्रियों का स्वभाव जानती थी, ने कहा कि स्त्री का हृदय एख धूर्त लोमड़ी के समान होता है. यदि कोई व्यक्ति अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण नहीं कर पात, तो वह ऐसी धूर्त लोमड़ियों का शिकार हो जाता है. किंतु अगर कोई इंद्रियों को नियंत्रित कर सके, तब धूर्त, लोमड़ी जैसी महिलाओं से पीड़ित होने की उसकी कोई संभावना नहीं होती है. चाणक्य पंडित ने यह भी सुझाव दिया है कि यदि किसी की पत्नी धूर्त लोमड़ी जैसी हो, तो उसे तुरंत गृहस्थ जीवन का त्याग कर वन में जाना चाहिए.

माता यस्य गृहे नास्ति भार्या चाप्रिया-वादिनी
अरण्यं तेन गंत्व्यं यथारण्यं तथा गृहम (चाणक्य-श्लोक 57)

कृष्ण चेतन गृहस्थों को धूर्त लोमड़ी जैसी स्त्रियों से बहुत सावधान रहना चाहिए. अगर घर में पत्नी आज्ञाकारी है और कृष्ण भावनामृत में अपने पति का अनुसरण करती है, तो घर में स्वागत है. अन्यथा घर छोड़कर वन में चले जाना चाहिए.

हित्वात्मा-पातं गृहम अंध-कूपं वनम् गतो यद् धारिम आश्रयेत (भाग. 7.5.5)

व्यक्ति को वन में चले जाना चाहिए और हरि, भगवान के परम व्यक्तित्व के चरण कमलों की शरण लेनी चाहिए.”

स्रोत:अभय चरणारविंद भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद (2014 संस्करण, अंग्रेज़ी), श्रीमद् भागवतम्, नौवाँ सर्ग, अध्याय 14- पाठ 36

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