श्रील विश्वनाथ ठाकुर चक्रवर्ती समझाते हैं कि यदु वंश का भ्रातृहंता युद्ध और भगवान कृष्ण पर आखेटक का आक्रमण स्पष्ट रूप से भगवान की लीला इच्छाओं को पूरा करने के उद्देश्य से भगवान की आंतरिक शक्ति के ही कृत्य हैं। प्रमाणों के अनुसार, यदु वंश के सदस्यों के बीच झगड़ा सूर्यास्त के समय हुआ था; तब भगवान सरस्वती नदी के तट पर बैठ गए थे। ऐसा कहा जाता है कि तब एक आखेटक एक हिरण को मारने के मंतव्य से पहुँचा था, किंतु इसकी संभावना बहुत कम है – जब 56 करोड़ से अधिक योद्धा अभी-अभी एक महा हिंसक युद्ध में मारे गए थे और वह स्थान रक्त और लाशों से पट गया था – कि एक साधारण आखेटक किसी प्रकार एक हिरण को मारने की चेष्टा कर रहा होगा। चूंकि हिरण स्वभाव से ही डरपोक और भीरू होते हैं, ऐसे में इतनी बड़ी लड़ाई के परिदृश्य में कोई हिरण संभवतः कैसे हो सकता है, और इस तरह के नरसंहार के बीच एक आखेटक शांति से अपना कार्य कैसे कर सकता है? इसलिए, यदु वंश का निष्कासन और भगवान कृष्ण का स्वयं इस धरती से अंतर्धान होना भौतिक ऐतिहासिक घटनाएँ नहीं थीं; इसके बजाय वे पृथ्वी पर उनकी प्रकट लीलाओं को समाप्त करने के उद्देश्य से भगवान की आंतरिक शक्ति का प्रदर्शन थे।

स्रोत: अभय चरणारविंद. भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद (2014 संस्करण, अंग्रेज़ी), “श्रीमद्भागवतम”, ग्यारहवाँ सर्ग, अध्याय 30 – पाठ 37.

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