अतिथि का सत्कार करना एक गृहस्थ का कर्तव्य होता है, भले ही अतिथि कोई शत्रु हो. अतिथि शब्द बिना आमंत्रण ही आ जाने वाले व्यक्ति के संदर्भ में है. जब कोई अतिथि किसी के घर आता है, तो व्यक्ति को उसकी आगवानी उचित रूप से खड़े होकर और उसे आसन देकर करना चाहिए. ऐसा निर्देश है, गृहे शत्रुम् अपि प्राप्तम् विश्वस्तुम् अकूतोभयम्: यदि कोई शत्रु भी किसी के घर आए, तो व्यक्ति को उसकी आगवानी इस प्रकार करना चाहिए कि वह भूल जाए कि उसका यजमान एक शत्रु है. अपनी क्षमता के अनुसार, व्यक्ति को उन सभी की आगवानी करना चाहिए जो उसके घर पर आता है. कम से कम एक आसन और एक गिलास पानी तो प्रस्तुत करना ही चाहिए, ताकि अतिथि अप्रसन्न न हो.

स्रोत – अभय चरणारविंद स्वामी प्रभुपाद (2014 संस्करण, अंग्रेज़ी), “श्रीमद् भागवतम्” , आठवाँ सर्ग, अध्याय 16 – पाठ 6

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