विभिन्न शास्त्रों से संदर्भ लेकर श्रील रूप गोस्वामी ने भगवान के पारलौकिक गुणों की गणना निम्न प्रकार से की है: 1) संपूर्ण शरीर की सुंदरता; 2) सभी शुभ लक्षणों से चिन्हित; 3) अत्यंत मधुर; 4) दीप्तिमान; 5) बलशाली; 6) सर्वदा युवा; 7) असाधारण भाषाविद; 8) सत्यप्रिय; 9) मृदुभाषी; 10) सभी भाषाओं में धाराप्रवाह बोलने में सक्षम; 11) अत्यंत विद्वान; 12) उच्च बुद्धिमान; 13) प्रतिभावान; 14) कलात्मक; 15) अत्यधिक चतुर; 16) विशेषज्ञ; 17) आभारी; 18) दृढ़ निश्चयी; 19) समय और परिस्थितियों के विशेषज्ञ निर्णायक; 20) वेदों की प्रामाणिकता के खोजी और वक्ता; 21) शुद्ध; 22) आत्म-नियंत्रण धारी; 23) अचल; 24) धैर्यवान; 25) क्षमाशील; 26) गंभीर; 27) आत्म-संतुष्ट; 28) संतुलनधारी; 29) उदार; 30) धार्मिक; 31) वीरोचित; 32) करुणामय; 33) शिष्ट; 34) सौम्य; 35) उदारचेता; 36) संकोची; 37) शरणागत आत्मा के संरक्षक; 38) प्रसन्न; 39) भक्तों के शुभचिंतक; 40) प्रेम द्वारा नियंत्रित; 41) सर्वदा-शुभ; 42) सर्व शक्तिमान; 43) सर्व-प्रसिद्ध; 44) लोकप्रिय; 45) भक्तों के पक्षधर; 46) सभी स्त्रियों के लिए आकर्षक; 47) सर्व-पूज्यनीय; 48) सर्व-एश्वर्यमान; 49) सर्व-सम्माननीय; 50) परम नियंत्रक. भगवान के परम व्यक्तित्व में ये सभी पचास पारलौकिक गुण समुद्र की गहराई के समान पूर्णता में होते हैं. दूसरे शब्दों में, उनके गुणों की सीमा अकल्पनीय है. परम भगवान के अंश के रूप में, विभिन्न जीव भी सीमित मात्रा में इन सभी गुणों के स्वामी हो सकते हैं, बशर्ते वे भगवान के शुद्ध भक्त बन जाएँ. दूसरे शब्दों में, उपरोक्त सभी पारलौकिक गुण पूर्ण रूप से भगवान के परम व्यक्तित्व में हमेशा मौजूद होते हैं. उपरोक्त वर्णित इन पचास गुणों के अलावा, भगवान कृष्ण पाँच अतिरिक्त गुणों के स्वामी हैं, जो कभी-कभी भगवान ब्रम्हा और भगवान शिव के व्यक्तित्वों में आंशिक रूप से प्रकट होते हैं. ये पारलौकिक गुण इस प्रकार हैं: 51) अपरिवर्तनीय; 52) सर्व-ज्ञाता; 53) सदैव-निर्मल; 54) सद्-चित-आनंद (एक शाश्वत आनंदमयी शरीर के स्वामी); 55) सर्व रहस्यमयी पूर्णता के स्वामी. कृष्ण के पाँच अन्य गुण भी हैं, जो नारायण के शरीर में प्रकट होते हैं, और उनकी सूची इस प्रकार है: 56) उनकी शक्ति अकल्पनीय है. 57) उनके शरीर से असंख्य ब्रम्हांड जन्म लेते हैं. 58) वे सभी अवतारों के मूल स्रोत हैं. 59) वे उन शत्रुओं का उद्धार करते हैं जिनका वे वध करते हैं. 60) वे मुक्त आत्माओं को आकर्षित करते हैं. ये सभी पारलौकिक गुण आश्चर्यजनक रूप से भगवान कृष्ण के व्यक्तिगत गुणों में प्रकट होते हैं. इन साठ पारलौकिक गुणों के अलावा, कृष्ण के चार गुण और हैं, जो कि परम भगवान के नारायण स्वरूप में भी प्रकट नहीं होते, देवता और जीवों की तो बात ही क्या है. वे इस प्रकार हैं: 61) वे आश्चर्यजनक लीलाओं के कर्ता हैं (विशेषकर उनकी बाल्यकालीन लीलाएँ). 62) वे अपनी बाँसुरी बजा कर ब्रम्हांड में सभी ओर सभी जीवों को आकर्षित कर सकते हैं. 63) वे परम भगवान के प्रेम से संपन्न भक्तों से घिरे होते हैं. 64) उनके सौंदर्य की उत्कृष्टता अनोखी है जिसकी तुलना संसार में कहीं भी नहीं मिलती. कृष्ण के इन चार गुणों को मिलाते हुए, यह समझा जा सकता है कि कृष्ण के सभी गुणों की संख्या कुल चौंसठ है.

<span style=”color: #00CCFF;”>अभय चरणारविंद भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद (2011 संस्करण, अंग्रेजी), “समर्पण का अमृत”, पृ. 155, 156 और 157</span>

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