शांतम शब्द का अर्थ है “सदैव एक ही रूप में.” शांतम का अर्थ “अव्यथित, कामना से मुक्त, या शुद्ध” भी हो सकता है. वैदिक दर्शन के अनुसार, इस संसार में सभी परिवर्तन लालसा और अज्ञानता के प्रभाव के कारणवश होते हैं. भावुकता का गुण रचनात्मक है, और अज्ञानता का गुण विनाशकारी है, जबकि अच्छाई का गुण, सत्व, शांत और स्थायित्व वाला होता है. कई अर्थों में यह श्लोक इस बात पर बल देता है कि भगवान कृष्ण प्रकृति के गुणों से मुक्त हैं. विशुद्ध-सत्वम्, शांतम, धवस्त-रजस-तमस्कम् और गुण-संप्रवाहो न विद्यते ते, ये सभी शब्द इस ओर ही संकेत करते हैं. कृष्ण के विपरीत, प्रकृति के गुणों से जुड़े होने के कारण हम एक शरीर से दूसरे शरीर में परिवर्तित होते हैं; भौतिक रूपों के विभिन्न परिवर्तन प्रकृति के गुणों से प्रेरित होते हैं, जो स्वयं समय के प्रभाव से गतिमान होते हैं. इसलिए जो प्रकृति के भौतिक गुणों से मुक्त है, वह अपरिवर्तनशील है और आनंदमय आध्यात्मिक अस्तित्व में सदा संतुष्ट होता है. इस प्रकार शांतम शब्द इंगित करता है कि भगवान परिवर्तन से विचलित नहीं होते हैं, क्योंकि वे प्रकृति के भौतिक गुणों से मुक्त हैं.

स्रोत:अभय चरणारविंद भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद (2014 संस्करण, अंग्रेज़ी), श्रीमद् भागवतम्, दसवाँ सर्ग, अध्याय 27- पाठ 04

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